ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1852, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयः परस्याः परावतस्तिरो धन्वातिरोचते. स नः पर्षदति द्विषः.. (२) जो अग्नि अत्यंत दूरवर्ती आकाश को पार करके आए हैं, वे हमें शत्रु से बचावें. (२) यो रक्षांसि निजूर्वति वृषा शुक्रेण शोचिषा. स नः पर्षदति द्विषः.. (३) जो अग्नि अपनी वर्षाकारक एवं उज्ज्वल ज्वाला से राक्षसों का नाश करते हैं, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (३) यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति. स नः पर्षदति द्विषः.. (४) जो अग्नि सारे संसार को एक-एक करके एवं सामूहिक रूप से देखते हैं वे शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. (४) यो अस्य पारे रजसः शुक्नो अग्निरजायत. स नः पर्षदति द्विषः.. (५) जिन अग्नि ने इस अंतरिक्ष के पार उज्ज्वल रूप में जन्म लिया है, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (५) सूक्त—१८८ देवता—ज्ञानी अग्नि प्र नूनं जातवेदसमश्वं हिनोत वाजिनम्. इदं नो बर्हिरासदे.. (१) हे ऋत्विजो एवं यजमानो! ज्ञानी, व्याप्त एवं अन्न वाले अग्नि को कुशों पर बैठने के लिए बुलाओ. (१) अस्य प्र जातवेदसो विप्रवीरस्य मीळ्हुषः. महीमियर्मि सुष्टुतिम्... (२) विद्वान्, यजमानों के पिता एवं वर्षाकारक अग्नि के लिए मैं यह विशाल तथा शोभन स्तुति करता हूं. (२) या रुचो जातवेदसो देवत्रा हव्यवाहनीः ताभिर्नो यज्ञमिन्वतु.. (३) अग्नि की जो ज्वालाएं देवों के लिए हव्यवहन करने वाली हैं, उनके द्वारा अग्नि हमारे यज्ञ की रक्षा करें. (३) सूक्त—१८९ देवता—सूर्य एवं सार्पराज्ञी आयं गौः पृश्निरक्रमीदसद्न् मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (१) गमनशील व तेज प्राप्त करने वाले सूर्य उदयाचल को पाकर अपनी माता पूर्व दिशा को ebook converter DEMO Watermarks*