भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

यज्ञ और अन्न के लिए प्रसन्न हों. (११) स रेवाँ इव विशपतिर्देव्यः केतुः शृणोतु नः. उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः.. (१२) अग्नि प्रजापालक, देवताओं के होता, दूत के समान देवताओं का ज्ञापन करने वाले एवं स्तुति सुनने वाले हैं. उसी प्रकार अग्नि हमारी स्तुति सुनें. (१२) नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः. यजाम देवान्यदि शन्कवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः.. (१३) बड़े, बालक, युवा एवं वृद्ध सभी देवताओं को हम नमस्कार करते हैं. यदि संभव होगा तो हम देवताओं की पूजा करेंगे. हम कहीं विशिष्ट गुणसंपन्न देवों की स्तुति करना न छोड़ दें. (१३) सूक्त—२८ देवता—इंद्र आदि यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (१) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए भारी जड़ वाला पत्थर उठाया जाता है और ओखली की सहायता से सोमरस तैयार किया जाता है, वहां सोमरस अपना जानकर पिओ. (१) यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (२) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता को निचोड़ने के लिए दोनों फलक जांघों के समान फैल गए हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (२) यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (३) हे इंद्र! जिस यज्ञ में यजमान की पत्नियां भीतर घुसती और बाहर निकलती रहती हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (३) यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (४) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता मंथन करने का दंड घोड़े की लगाम के समान बांधा जाता है, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (४)