भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 203

हे अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करता है, उसके लिए तुम अन्न प्रदान करने हेतु उत्तम और स्थायी पद पर प्रतिष्ठित कर देते हो. जो यजमान मनुष्यों एवं पशुओं को प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक है, उस बुद्धिमान् यजमान को तुम सुख और अन्न दो. (७) त्वं नो अग्ने सनये धनानां यशसं कारुं कृणुहि स्तवानः. ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (८) हे अग्नि! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें धन एवं यश देने वाला तथा यज्ञकर्म करने वाला पुत्र प्रदान करो. तुम्हारे द्वारा दिए गए नवीन पुत्र से हम पराक्रम में उन्नति करेंगे. हे धरती और आकाश! तुम अन्य देवों के साथ मिलकर हमारी ठीक से रक्षा करो. (८) त्वं नो अग्ने पित्रोरुपस्थ आ देवो देवेष्वनवद्य जागृवि. तनूकृद्बोधि प्रमतिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिषे.. (९) हे दोषरहित अग्नि! तुम सब देवों की अपेक्षा जागरूक हो. तुम अपने माता-पिता धरती-आकाश के पास रहकर अनुग्रह के रूप में हमें पुत्र दो एवं यज्ञकर्त्ता यजमान के प्रति प्रसन्नचित्त रहो. हे कल्याणकारक! तुम यजमान के लिए सभी प्रकार की संपत्ति प्रदान करो. (९) त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम्. सं त्वा रायः शतिनः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य.. (१०) हे अग्नि! तुम हम पर अनुग्रह बुद्धि रखते हो. तुम हमारे पालक हो. तुम हमें दीर्घ जीवन देते हो. हम तुम्हारे बंधु हैं. कोई तुम्हारी हिंसा नहीं कर सकता, क्योंकि तुम शोभन पुरुषों से युक्त एवं यज्ञ के पालन करनेवाले हो. तुम्हें सैकड़ों एवं हजारों प्रकार की संपत्तियां भली प्रकार प्राप्त हैं. (१०) त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विशपतिम्. इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते.. (११) हे अग्नि! तुम्हें देवों ने प्राचीन काल में मनुष्य रूपधारी नहुष व मानव शरीर वाला सेनापति बनाया था. जिस समय तुमने मेरे पिता अंगिरा ऋषि के पुत्र के रूप में जन्म लिया था, उसी समय देवों ने इला को मनु की धर्मोपदेशकत्रीं बनाया. (११) त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य. त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषं रक्षमाणस्तव व्रते.. (१२) हे वंदनीय अग्नि! तुम अपनी रक्षणशक्ति द्वारा हम धनवानों एवं हमारे पुत्रों के शरीर की रक्षा करो. हमारे पौत्र तुम्हारे यज्ञ में सदा लगे रहते हैं. तुम उनकी गायों की रक्षा करो. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*