भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 1855 में से

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वेदी पर तीन परतों के रूप में बिछी हुई कुशाओं पर शयन करो. शरीर में जिस प्रकार प्राणवायु आती है, उसी प्रकार तुम तीन यज्ञस्थानों में आओ. (७) त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम्. तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! सिंधु आदि सात नदियों के जल से तीन सोमाभिषेक हुए हैं. जलों के आधार तीन कलश और तीन सवनों से संबंधित तीन प्रकार की हवि तैयार है. तुमने पृथ्वी आदि तीनों लोकों से ऊपर जाकर दिवसरात्रियुक्त आकाश में सूर्य की रक्षा की थी. (८) क्व३त्री चक्रा त्रिवृतो रथस्य क्व३त्रयो वन्धुरो ये सनीळाः. कदा योगो वाजिनो रासभस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः.. (९) हे नासत्यो! तुम्हारे तीन कोने वाले रथ के तीन पहिए कहां हैं? रथ के ऊपर जो बैठने का स्थान है, उसके तीन बंधनाधार रूप डंडे कहां हैं? तुम्हारे रथ में बलवान् गधे न जाने कब जोड़े गए? उन्हीं के द्वारा तुम हमारे यज्ञ में आते हो. (९) आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिः. युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तामिष्यति.. (१०) हे नासत्यो! इस यज्ञ में आओ. मैं तुम्हें हवि देता हूं. तुम मधुर पदार्थों का पान करने वाले अपने मुखों से मधुर हवि पिओ. तुम्हारे विचित्र और धुरी में घी लगे हुए रथ को हमारे यज्ञ में आने के लिए उषा ने पहले ही प्रेरणा दी थी. (१०) आ नासत्या त्रिभिरेकादशैर्रिह देवेभिर्यातं मधुपयेमश्विना. प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा.. (११) हे नासत्य अश्विनीकुमारो! तैंतीस देवताओं के साथ मधुर सोमरस पीने के लिए इस यज्ञ में आओ, हमें दीर्घायु करो, हमारे पापों का नाश करो, हमारे शत्रुओं को रोको और हमारे साथ रहो. (११) आ नो अश्विना त्रिवृता रथेनार्वाञ्चं रयिं वहतं सुवीरम्. शृण्वन्ता वामवसे जोहवीमि वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तीनों लोकों में चलने वाले अपने रथ द्वारा हमारे पास पुत्र, सेवक आदि सहित धन लाओ. तुम हमारी स्तुति सुनो. हम अपनी रक्षा के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हमारी उन्नति करो और संग्राम में हमें शक्ति दो. (१२) सूक्त—३५ देवता—सविता ebook converter DEMO Watermarks*