भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 237

उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः. अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम्.. (४) हे उषा! तुम्हारा गमन आरंभ होते ही विद्वान् लोग धन आदि के दान में दत्तचित्त हो जाते हैं. परम मेधावी कण्व ऋषि इन दानेच्छु लोगों के नाम उषाकाल में उच्चारण करते हैं. (४) आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती. जरयन्ती वृजनं पद्बदीयत उत्पातयति पक्षिणः.. (५) उषा घर का काम करने वाली योग्य गृहिणी के समान सबका पालन करती हुई, गमनशाली प्राणियों को बूढ़ा बनाती हुई, पैरों वाले प्राणियों को चलाती हुई और उड़ाती हुई आती है. (५) वि या सृजति समनं व्य१र्थिनः पदं न वेत्योदती. वयो नकिष्टे पत्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति.. (६) तुम कर्मठ पुरुष को काम में लगाती हो और भिक्षुकों को घर छोड़ने पर विवश कर देती हो. तुम ओस बरसाने वाली हो एवं अधिक देर नहीं ठहरती हो. हे अन्नसंपन्ना उषा! तुम्हारे प्रभातकाल में पक्षीगण अपने घोंसलों में नहीं रह पाते. (६) एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि. शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान्.. (७) यह सौभाग्यशालिनी एवं रथ में घोड़े जोड़ने वाली उषा दूर सूर्य के उदय स्थान से सौ रथों द्वारा मनुष्यों के समीप आती है. (७) विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी. अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्चदप सिधः.. (८) समस्त प्राणी इस उषा के प्रकाश को नमस्कार करते हैं, क्योंकि यह सुंदर नेत्री उषा प्रकाश देती है और यही धनवती स्वर्गपुत्री द्वेषियों एवं शोषकों को दूर भगाती है. (८) उष आ भाहि भानुना चन्द्रेण दुहितर्दिवः. आवहन्ती भूर्यस्मभ्यं सौभगं व्युच्छन्ती दिविष्टिषु.. (९) हे स्वर्गपुत्री उषा! तुम सबको प्रसन्न करने वाली ज्योति के साथ प्रकाशित होती हुई हमें प्रतिदिन सौभाग्य दो एवं अंधकार को मिटाओ. (९) विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनरि. eBook converter DEMO Watermarks*