भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 250

प्रभूत यशस्वी एवं शक्तिसंपन्न इंद्र के प्रति स्तुतिवचनों का उच्चारण करो. वे इंद्र शत्रुनाशक, अश्वों द्वारा सेवित, कामनाएं पूर्ण करने वाले एवं वेगवान् हैं. (३) त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत्. यन्मायिनो वन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि.. (४) हे इंद्र! तुमने विशाल आकाश के ऊपर उठा हुआ प्रदेश कंपित कर दिया था एवं शत्रुनाशक शक्ति द्वारा शंबर असुर का वध किया था. तुमने हर्षित एवं प्रगल्भ मन से तेज धार वाले तथा चमकीले वज्र को मायावी असुर समूह की ओर चलाया था. (४) नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना. प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वो परि.. (५) हे इंद्र! तुम वायु के तथा जल सोखने वाले एवं फलों को पकाने वाले सूर्य के ऊपर वाले प्रदेश में जल बरसाते हो. हे दृढ़ निश्चय एवं शत्रुविनाशक हृदय वाले इंद्र! आज आपने पराक्रम दिखाया है, उससे स्पष्ट है कि आपसे बढ़कर कोई नहीं है. (५) त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो. त्वं रथेमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव.. (६) हे शतक्रतु! तुमने नर्य, तुर्वश, यदु एवं वय्य कुल में उत्पन्न तुर्वीति नामक राजाओं की रक्षा की है. तुमने धन प्राप्ति के उद्देश्य से प्रारंभ संग्राम में रथ एवं एतश ऋषियों की रक्षा की तथा शंबर असुर के निन्यानवे नगरों का ध्वंस किया है. (६) स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति. उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः.. (७) वे ही यजमान सुशोभित होकर सज्जनों के पालन के साथ-साथ अपनी भी वृद्धि करते हैं, जो इंद्र को हव्य प्रदान करके उनकी स्तुति करते हैं. अभिमत फलदाता इंद्र ऐसे ही लोगों के लिए आकाश से मेघों द्वारा वर्षा करते हैं. (७) असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे. ये त इन्द्र ददृषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च.. (८) इंद्र का बल एवं बुद्धि अतुलनीय है. हे इंद्र! जो सोमपायी यजमान अपने यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारा महान् बल एवं स्थूल पौरुष बढ़ाते हैं, उनकी उन्नति हो. (८) तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूसदश्चमसा इन्द्रपानाः. व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

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