भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 256

अग्नि हव्य का वहन करते हुए रुद्रों तथा वसुओं के सम्मुख स्थान प्राप्त कर चुके हैं एवं देवों का आह्वान करने के निमित्त यज्ञों में उपस्थित रहते हैं. शत्रुओं का धन जीतने वाले, मरणरहित एवं दीप्तिमान् अग्नि यजमानों द्वारा स्तुत होकर रथ की भांति चलते हुए प्रजाओं के पास पहुंचते हैं एवं बार-बार श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं. (३) वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः. तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर.. (४) वायु द्वारा प्रेरित अग्नि महान् शब्द करते हुए अपनी जलती हुई एवं तीव्र ज्वालाओं के द्वारा अनायास ही पेड़ों को जला देते हैं. हे अग्नि देव! तुम जिस समय वन के वृक्षों को जलाने के लिए सांड़ के समान उतावले होते हो, उस समय तुम्हारे गमन का मार्ग काला पड़ जाता है. हे अग्नि! तुम दीप्त ज्वालाओं वाले एवं जरारहित हो. (४) तपुर्जम्भो वन आ वातचोदितो यूथे न साह्वां अव वाति वंसगः. अभिव्रजन्नक्षितं पाजसा रजः स्थातुश्चरथं भयते पतत्रिणः.. (५) वायु द्वारा प्रेरित अग्नि शिखारूपी आयुध धारण कर लेता है तथा महान् तेज के कारण गीले वृक्षों के रस पर आक्रमण करके सर्वत्र व्याप्त होता हुआ प्राणियों को उसी प्रकार पराजित कर देता है, जिस प्रकार गायों के झुंड में सांड़ पहुंच जाता है. समस्त स्थावर एवं जंगम अग्नि से डरते हैं. (५) दधृष्ट्वा भृगवो मानुषेष्वा रयिं न चारुं सुहवं जनेभ्यः. होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने.. (६) हे अग्नि! मनुष्यों के बीच में भृगु ऋषि ने दिव्य जन्म प्राप्त करने के लिए तुम्हें उसी प्रकार धारण किया था, जिस प्रकार लोग उत्तम धन को संभाल कर रखते हैं. तुम लोगों का आह्वान सरलता से सुन लेते हो एवं देवों का आह्वान करने वाले हो. तुम यज्ञस्थान में अतिथि के समान पूजनीय एवं मित्र के समान सुख देने वाले हो. (६) होतारं सप्त जुह्वो३यजिष्ठं यं वाघतो वृणते अध्वरेषु. अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम्.. (७) आह्वान करने वाले सात ऋत्विज् यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ यजनीय एवं देवों के आह्वानकर्त्ता जिस अग्नि का वरण करते हैं, समस्त संपत्तियां देने वाले उसी अग्नि की सेवा मैं हव्य के द्वारा कर रहा हूं तथा उस अग्नि से रमणीय धन की याचना कर रहा हूं. (७) अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ. अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः.. (८) हे अग्नि! तुम बल प्रयोग द्वारा अरणि से उत्पन्न एवं अनुकूल प्रकाश वाले हो. तुम हमें ebook converter DEMO Watermarks*

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