ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोभनकर्म वाले, अति बलसंपन्न एवं सुंदरयज्ञों से युक्त इंद्र पहले से ही यजमानों के प्रति मित्रता का भाव रखते आए हैं. हे इंद्र! तुमने भली प्रकार युवती न होने वाली, काले और लाल रंग की गायों में श्वेत वर्ण का दूध धारण कराया है. (९) सनात्सनीळा अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभिः. पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम्.. (१०) हमारी उंगलियां चिरकाल से गतिशील रहकर एक साथ निवास करती हुईं, आलस्यहीन होकर अपनी ही शक्ति से इंद्र संबंधी हजारों यज्ञों का अनुष्ठान कर चुकी हैं. वे ही सेवासंलग्न उंगलियां पालन करने वाली बहिन के समान इंद्र की परिचर्या करती हैं. (१०) सनायुवो नमसा नव्यो अर्कैर्वसूयवो मतयो दस्म ददृः. पतिं न पत्नीरुशतीरुशन्तं स्पृशन्ति त्वा शवसावन्मनीषाः.. (११) हे दर्शनीय इंद्र! लोग मंत्र और प्रणाम के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं. अग्निहोत्र आदि सनातन कर्म एवं धन की इच्छा करने वाले बुद्धिमान् लोग बड़े प्रयत्नों के बाद तुम्हें प्राप्त करते हैं. हे बलवान् इंद्र! जैसे पतिकाम नारियां पति को प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार बुद्धिमानों की स्तुतियां तुम्हारे पास पहुंचती हैं. (११) सनादेव तव रायो गभस्तौ न क्षीयन्ते नोप दस्यन्ति दस्म. द्युमाँ असि क्रतुमाँ इन्द्र धीरः शिक्षा शचीवस्तव नः शचीभिः.. (१२) हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारे हाथ में चिरकाल से जो संपत्ति है, वह कभी समाप्त नहीं होती और स्तोताओं को देने पर भी कम नहीं होती. हे इंद्र! तुम बुद्धिमान्, दीप्तिसंपन्न तथा यज्ञकर्मयुक्त हो. हे कर्मठ इंद्र! अपने कर्मों द्वारा हमें घर दो. (१२) सनायते गोतम इन्द्र नव्यमतक्षद्ब्रह्म हरियोजनाय. सुनीथाय नः शवसान नोधाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१३) हे इंद्र! तुम सबके आदि हो. हे बलवान्! तुम रथ में अपने घोड़े जोड़ते हो एवं शोभन नेता हो. गौतम ऋषि के पुत्र नोधा ने हमारे निमित्त तुम्हारा यह नवीन स्तोत्र बनाया है, इसलिए कर्म के द्वारा धन प्राप्त करने वाले इंद्र इस स्तोत्र से आकर्षित होकर प्रातःकाल जल्दी आवें. (१३) सूक्त—६३ देवता—इंद्र त्वं महां इन्द्र यो ह शुष्मैर्द्यावा जज्ञानः पृथिवी अमे धाः. यद्ध ते विश्वा गिरयश्चिद्द्भ्वा भिया दृळ्हासः किरणा नैजन्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*