ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वारा आकाश को भी धारण किए हैं। हे संपूर्ण अन्न के स्वामी अग्नि! पशुओं के प्रिय स्थानों की रक्षा करो एवं ऐसे स्थान में जाओ जो गायों के संचार के अयोग्य हो। (५-६) य ईं चिकेत गुहा भवन्तमा यः ससाद धारामृतस्य. वि ये चृतन्त्यृता सपन्त आदिद्वसूनि प्र ववाचास्मै.. (७-८) अग्नि देव ऐसे लोगों को अविलंब धन प्रदान करते हैं जो यज्ञस्थल में वर्तमान अग्नि को जानते हैं, सत्य के धारणकर्त्ता हैं व अग्नि के उद्देश्य से स्तुतियां करते हैं। (७-८) वि यो वीरुत्सु रोधन्महित्वोत प्रजा उत प्रसूष्वन्तः. चित्तिरपां दमे विश्वायुः सद्मेव धीराः संमाय चक्रुः.. (९-१०) मेधावी पुरुष ओषधियों में उनके गुण अवरुद्ध करने वाले, मातृरूप ओषधियों में पुष्प, फल आदि स्थापित करने वाले, जल मध्यस्थ यज्ञगृह में वर्तमान, ज्ञानदाता एवं समस्त अन्न के स्वामी अग्नि की पहले घर के समान पूजा करके बाद में कर्म करते हैं। (९-१०) सूक्त—६८ देवता—अग्नि श्रीणन्नुप स्थाद्दिवं भुरुण्युः स्थातुश्चरथमक्तून्व्यूर्णोत्. परि यदेषामेको विश्वेषां भुवद्देवो देवानां महित्वा.. (१-२) हव्य धारणकर्त्ता अग्नि दूध आदि हवनीय द्रव्यों को मिलाते हुए आकाश में पहुंच जाते हैं तथा अपने तेज द्वारा स्थावर, जंगम विश्व के साथ-साथ रात्रि को भी प्रकाशित करते हैं. अग्नि इंद्रादि समस्त देवों की अपेक्षा प्रकाशमान एवं स्थावर, जंगम को व्याप्त किए हैं। (१-२) आदित्ते विश्वे क्रतुं जुषन्त शुष्काद्यद्देव जीवो जनिष्ठाः. भजन्त विश्वे देवत्वं नाम ऋतं सपन्तो अमृतमेवैः.. (३-४) हे तेजस्वी अग्नि! तुम प्रज्वलित होते हुए अरणिरूप सूखे काष्ठ से जब जब उत्पन्न होते हो, तभी यजमान यज्ञकर्म आरंभ करते हैं. वे यजमान स्तोत्रों द्वारा तुझ मरणरहित अग्नि की सेवा करके देवत्व प्राप्त करते हैं। (३-४) ऋतस्य प्रेषा ऋतस्य धीतिर्विश्वायुर्विश्वे अपांसि चक्रुः. यस्तुभ्यं दाशाद्यो वा ते शिक्षात्तस्मै चिकित्वान्रयिं दयस्व.. (५-६) ज्यों ही अग्नि यज्ञभूमि में पधारते हैं, त्यों ही उनकी स्तुतियां एवं यज्ञकर्म आरंभ हो जाते हैं. सब यजमान अन्नों के स्वामी अग्नि को लक्ष्य करके यज्ञ करते हैं. हे अग्नि! जो यजमान तुम्हें हव्य देता है अथवा तुम्हारे यज्ञकर्म की शिक्षा प्राप्त करता है, तुम उसके कर्म को जानते हुए उसे धन दो। (५-६) ebook converter DEMO Watermarks*