ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशकेम रायः सुधरो यमं तेऽधि श्रवो देवभक्तं दधानाः.. (१०) हे अग्नि! हमारे समस्त स्तोत्र तुम्हारे मन और अंतःकरण को प्रिय हों. हम देवों के भोग करने योग्य धन तुम में स्थापित करके तुम्हारे उस धन की रक्षा करना चाहते हैं जो हमारी दरिद्रता मिटा सके. (१०) सूक्त—७४ देवता—अग्नि उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (१) दूर रहकर भी हमारी स्तुतियां सुनने वाले एवं यज्ञ में शीघ्रता से उपस्थित होने वाले अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (१) यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु. अरक्षद्दाशुषे गयम्.. (२) शत्रु भाव से पूर्ण एवं हत्या करने में प्रवृत्त प्रजाओं के मध्य स्थित हवि देने वाले यजमान के धन के रक्षक अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (२) उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि. धनञ्जयो रणेरणे.. (३) शत्रुनाशक एवं संग्राम में शत्रु के धन पर अधिकार करने वाले अग्नि के उत्पन्न होते ही सब लोग उनकी स्तुति करें. (३) यस्य दूतो असि क्षये वेषि हव्यानि वीतये. दस्मत्कृणोष्यध्वरम्.. (४) हे अग्नि! जिस यजमान के यज्ञगृह में तुम देवदूत बनकर आते हो एवं उन देवों के भोग के लिए हवि ग्रहण करके यज्ञ की शोभा बढ़ाते हो. (४) तमित्सुहव्यमङ्गिरः सुदेवं सहसो यहो. जना आहुः सुबर्हिषम्.. (५) हे बलपुत्र अग्नि! उसी यजमान को सब लोग शोभन हविसंपन्न, सुंदर देवों वाला एवं उत्तम यज्ञयुक्त कहते हैं. (५) आ च वहासि ताँ इह देवाँ उप प्रशस्तये. हव्या सुश्चन्द्र वीतये.. (६) हे शोभन एवं आह्लादक अग्नि! हमारी स्तुति स्वीकार करने के लिए इस यज्ञ में देवों को हमारे समीप ले आओ एवं उनके भक्षण के लिए हव्य प्रदान करो. (६) न योरुपब्दिरश्व्यः शृण्वे रथस्य कच्चन. यदग्ने यासि दूत्यम्.. (७) हे अग्नि! जब तुम देवों के दूत बनकर जाते हो तो शीघ्र चलने के कारण तुम्हारे रथ का eBook converter DEMO Watermarks*