ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु एवं पुरु जन समूह के बीच स्थित हो, तब भी इन समस्त स्थानों से आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (८) यदिन्द्राग्नी अवमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यां परमस्यामुत स्थः. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (९) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम निचली धरती अथवा मध्यस्थ आकाश में स्थित हो, तब भी वहां से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (९) यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यामवमस्यामुत स्थः. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (१०) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम आकाश के परवर्ती, मध्यवर्ती या निम्नवर्ती धरातल में वर्तमान हो, तब भी इन स्थानों से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (१०) यदिन्द्राग्नी दिवि ष्ठो यत्पृथिव्यां यत्पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (११) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! तुम चाहे आकाश, पृथ्वी, पर्वतों, ओषधियों अथवा जल में स्थित हो, तब भी इन स्थानों से आओ और निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (११) यदिन्द्राग्नी उदिता सूर्यस्य मध्ये दिवः स्वधया मादयेथे. अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य.. (१२) हे कामवर्षक इंद्र और अग्नि! यदि तुम उदित सूर्य के कारण प्रकाशित आकाश में अपने ही तेज से प्रसन्न हो रहे हो, तब भी वहां से आओ और निचोड़ा हुआ सोम पिओ. (१२) एवेन्द्राग्नी पपिवांसा सुतस्य विश्वास्मभ्यं सं जयतं धनानि. तन्नो मित्रा वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः... (१३) हे इंद्र और अग्नि! निचोड़े हुए सोमरस को इस प्रकार पीकर हमारे लिए सभी संपत्तियां दो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश हमारे इस धन का आदर करें. (१३) सूक्त—१०९ देवता—इंद्र और अग्नि वि ह्यख्यं मनसा वस्य इच्छन्निन्द्राग्नी ज्ञास उत वा सजातान्. नान्या युवत्प्रमतिरस्ति मह्यं स वां धियं वाजयन्तीमतक्षम्.. (१) हे इंद्र और अग्नि! धन की कामना करता हुआ मैं तुम्हें जाति या बंधु के समान समझता हूं. मेरी उत्तम बुद्धि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य की दी हुई नहीं है. उसी बुद्धि से मैंने तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*