ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंबंधी उपायों के साथ आकर शंख बजाते हो, उन्हीं उपायों के साथ हमारे समीप भी आओ. (१) युवोर्दानाय सुभरा असश्चतो रथमा तस्थुर्वचसं न मन्तवे. याभिर्धियोऽवथः कर्मन्निष्टये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! अन्य देवों में आसक्तिरहित, शोभन स्तोत्र धारण करने वाले स्तोता धनलाभ के लिए तुम्हारे रथ के समीप उसी प्रकार पहुंचते हैं, जिस प्रकार न्यायपूर्ण वचन जानने वाले पंडित के पास लोग अपना फैसला कराने जाते हैं. तुम जिन उपायों से यज्ञ में लगे विशिष्ट ज्ञानियों की रक्षा करते हो, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२) युवं तासां दिव्यस्य प्रशासने विशां क्षयथो अमृतस्य मज्मना. याभिर्धेनुमस्वं१ पिन्वथो नरा ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (३) हे नेता रूपी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों स्वर्ग में उत्पन्न सोम रूपी अमृतपान से प्राप्त बल के कारण तीनों लोकों में वर्तमान प्रजाओं का शासन करने में समर्थ हो. रक्षा के जिन उपायों से तुमने प्रसव में असमर्थ गायों को शंयु नामक ऋषि के लिए दुधारू बना दिया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (३) याभिः परिज्मा तनयस्य मज्मना द्विमाता तूर्षु तरणिर्विभूषति. याभिस्त्रिमन्तुरभवद्विचक्षणस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! चारों ओर गमनशील वायु अपने पुत्र एवं माताओं से उत्पन्न अग्नि के बल से युक्त होकर तथा पालनोपायों द्वारा धावनशीलों में अति शीघ्रगामी बनकर सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. जिन उपायों द्वारा कक्षीवान् ऋषि विशिष्ट ज्ञानयुक्त हुए थे, उन्हीं उपायों द्वारा आओ. (४) याभी रेभं निवृतं सितमद्भ्य उद्वन्दनमैरयतं स्वर्दृशे. याभिः कण्वं प्र सिषासन्तमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षोपायों से असुरों द्वारा कुएं में फेंके गए एवं पाशबद्ध किए गए रेभ ऋषि को जल से बाहर निकाला था, इसी प्रकार वंदन नामक ऋषि को सूर्य दर्शन के लिए जल से निकाला था, असुरों द्वारा अंधकार में डाले गए एवं प्रकाश की इच्छा वाले कण्व ऋषि को जिन उपायों से बचाया था, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (५) याभिरन्तकं जसमानमारणे भुज्युं याभिर्व्यथिभिर्जिविन्विशुः. याभिः कर्कन्धुं वय्यं च जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षा संबंधी उपायों से असुरों द्वारा कुएं में गिराकर मारे जाते हुए राजर्षि अंतक की रक्षा की, समुद्र में डूबते हुए भुज्यु की रक्षा जिन व्यथारहित ebook converter DEMO Watermarks*