भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 346

हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा सरिताओं के तटों को जलपूर्ण किया था, अश्वविरहित रथ को विजय के लिए चलाया था तथा त्रिशोक को अपनी चुराई हुई गायों को पाने में समर्थ किया था, उन्हीं उपायों को साथ लेकर आओ. (१२) याभिः सूर्य परियाथः परावति मन्धातारं क्षेत्रपत्येष्यावतम्. याभिर्विप्रं प्र भरद्वाजमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा सूर्य को ग्रहण के अंधकार से मुक्त करने जाते हो, तुमने जिन उपायों द्वारा मांधाता की क्षेत्रपति कर्म में रक्षा की एवं मेधावी भरद्वाज को अन्न देकर बचाया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१३) याभिर्महामतिथिग्वं कशोजुवं दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्. याभिः पूर्भिद्ये त्रसदस्युमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा महान् अतिथि सत्कार करने वाले एवं राक्षसों के भय से जल में घुसने को प्रस्तुत दिवोदास को शंबर असुर द्वारा मारे जाते समय बचाया था तथा संग्राम में त्रसदस्यु ऋषि की रक्षा की, उन्हीं उपायों को लेकर आओ. (१४) याभिर्वम्रं विपिपानमुपस्तुतं कलिं याभिर्वित्तजानिं दुवस्यथः. याभिर्व्यश्वमुत पृथिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा पीने में संलग्न एवं स्तुति किए गए वम्र की, पत्नी प्राप्त करने वाले कलि की एवं अश्वहीन पृथि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (१५) याभिर्नरा शयवे याभिरत्रये याभिः पुरा मनवे गातुमीषथुः. याभिः शारीराजतं स्यूमरश्मये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१६) हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शंयु, अत्रि एवं प्रथम मनु को दुःख से निकलने का मार्ग बताया था एवं स्यूमरश्मि की रक्षा के उद्देश्य से उनके शत्रुओं पर बाण चलाया था, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१६) याभिः पठर्वा जठरस्य मज्मनाग्निर्नादीदेच्चित इद्धो अज्मन्ना. याभिः शर्यातमवथो महाधने ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! जिन उपायों द्वारा पठर्वा ऋषि शरीर बल पाकर संग्राम में उसी प्रकार दीप्त हुए, जिस प्रकार काष्ठों द्वारा जलाई गई अग्नि चमकती है. जिन उपायों से युद्ध में शर्यात की रक्षा की गई, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (१७) याभिरङ्गिरो मनसा निरण्यथोऽग्रं गच्छथो विवरे गोअर्णसः. ebook converter DEMO Watermarks*

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