भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 358

हे अश्विनीकुमारो! दिवोदास ने अन्न हव्य रूप में देकर तुम्हारी स्तुति की तो तुम उसके घर गए. उस समय तुम्हारी सेवा करने वाला रथ अन्न ले गया था. उस में घोड़े और मगर जुड़े थे. (१८) रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता. आ जाह्नावीं समनसोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! समान मन वाले तुम दोनों शोभन बल, धन, संतान एवं सुंदर शक्तियुक्त अन्न लेकर जह्नु ऋषि की प्रजाओं के पास गए थे. उन्होंने हव्य अन्नों के साथ दैनिक यज्ञ के तीनों भाग तुम्हें अर्पित किए थे. (१९) परिविष्टं जाहुषं विश्वतः सीं सुगेभिर्नक्तमूहथू रजोभिः. विभिन्दुना नासत्या रथेन वि पर्वताँ अजरयू अयातम्.. (२०) हे अश्विनीकुमारो! जरारहित तुम दोनों ने शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घेरे हुए जाहुष राजा को अपने सर्वभेदक लौह-निर्मित रथ द्वारा रात में सरल मार्ग से बाहर निकाला एवं ऐसे पर्वतों पर गए, जहां शत्रु न चढ़ सकें. (२०) एकस्या वस्तोरवतं रणाय वशमश्विना सनये सहस्रा. निरहतं दुच्छुना इन्द्रवन्ता पृथुश्रवसो वृषणावरातीः.. (२१) हे अश्विनीकुमारो! तुमने वश ऋषि की इसलिए रक्षा की थी कि वे एक दिन में हजार धन प्राप्त कर सकें. हे कामवर्षको! तुमने इंद्र के साथ मिलकर पृथुश्रवा को कष्ट देने वाले शत्रुओं को मारा था. (२१) शरस्य चिदार्त्तकस्यावतादा नीचादुच्चा चक्रथुः पातवे वाः. शयवे चिन्नासत्या शचीभिर्जसुरये स्तर्यं पिप्यथुर्गाम्.. (२२) हे अश्विनीकुमारो! तुमने कुएं के नीचे से जल को इसलिए ऊपर उठाया था, जिससे कि तुम्हारा स्तोता, ऋचत्क पुत्र शर जल पी सके. थके हुए शंयु की प्रसवरहित गाय को तुमने अपने कर्मों द्वारा दुग्धपूर्ण बनाया था. (२२) अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः. पशुं न नष्टमिव दर्शनाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय.. (२३) हे अश्विनीकुमारो! कृष्ण के पुत्र सीधे-सादे विश्वकाय ऋषि ने अपनी रक्षा की इच्छा से तुम्हारी प्रार्थना की. जिस प्रकार कोई खोया हुआ पशु उसके स्वामी को दिखा दे, उसी प्रकार तुमने उसके खोए हुए पुत्र विष्णापु को दिखा दिया था. (२३) दश रात्रीरशिवेना नव द्यूनवनद्धं श्रथितमप्स्व१न्तः. ebook converter DEMO Watermarks*