भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 400

हे ऋत्विजो! नित्य रहने वाले मित्र और वरुण को लक्ष्य करके प्रशंसनीय एवं महान् स्तोत्र को आरंभ करो एवं उन्हें द्रव्य देने का निश्चय कर लो. वे यजमानों को सुख देते हैं एवं स्वादिष्ट हवि का भक्षण करके भली-भांति सुशोभित होते हैं. उन्हीं के लिए घी एकत्र किया जाता है एवं प्रत्येक यज्ञ में उनकी स्तुति की जाती है. उनका बल अलंघनीय है एवं उनके देव होने में किसी को संदेह नहीं है. (१) अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिश्चक्षुर्भगस्य रश्मिभिः. द्युक्षं मित्रस्य सादनमर्यम्णो वरुणस्य च. अथा दधाते बृहदुक्थ्यं१ वय उपस्तुत्यं बृहद्वयः.. (२) सब लोगों ने देखा है कि महती उषा विस्तृत यज्ञ की ओर जाती है. गतिशील सूर्य का मार्ग आकाश प्रकाश से भर गया एवं सूर्यकिरणों से सभी को आंखें मिलीं. मित्र, अर्यमा और वरुण का आकाशरूपी घर उज्ज्वल प्रकाश से पूर्ण हो गया. हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों स्तुतियोग्य अन्न को अधिक मात्रा में धारण करो. (२) ज्योतिष्मतीमदितिं धारयत्क्षितिं स्वर्वतीमा सचेते दिवेदिवे जागृवांसा दिवेदिवे. ज्योतिष्मत्क्षत्रमाशाते आदित्या दानुनस्पती. मित्रस्तयोर्वरुणो यातयज्जनोऽर्यमा यातयज्जनः.. (३) यजमान ने अग्नि के तेज से युक्त, समस्त लक्षणों तथा स्वर्ग प्रदान करने वाली यज्ञवेदी अपने आप बनाई है. तुम दोनों एकत्र होकर प्रतिदिन सावधान रहो एवं प्रतिदिन यज्ञवेदी पर आकर तेज और बल प्राप्त करो. तुम अदिति के पुत्र एवं समस्त देवों के पालक हो. मित्र, वरुण और अर्यमा लोगों को अपने-अपने काम में लगाते हैं. (३) अयं मित्राय वरुणाय शन्तमः सोमो भूत्ववपानेष्वाभगो देवो देवेष्वाभगः. तं देवासो जुषेरत विश्वे अद्य सजोषसः. तथा राजाना करथो यदीमह ऋतावाना यदीमहे.. (४) नीचे की ओर मुंह करके पीने वाले मित्र और वरुण के लिए सोमपान प्रसन्नता प्रदान करे. समस्त देव अपनी सेवा के उपयुक्त एवं तेजस्वी सोम को प्रसन्नतापूर्वक पिएं. हे समान प्रीतयुक्त मित्र एवं वरुण! तुम यज्ञ के स्वामी हो. तुम हमारी प्रार्थना के अनुसार कार्य करो. (४) यो मित्राय वरुणायाविधज्जनोंऽनर्वाणं तं परि पातो अंहसो दाश्वांसं मर्तमंहसः. तमर्यमाभि रक्षत्यूजूयन्तमनु व्रतम्. उक्थैर्य एनोः परिभूषति व्रतं स्तोमैराभूषति व्रतम्.. (५) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपनी सेवा करने वाले, द्वेषरहित एवं हव्यदाता यजमान की समस्त पापों से रक्षा करो. अर्यमा सरल स्वभाव वाले यजमान को देखते हैं एवं उसकी रक्षा ebook converter DEMO Watermarks*