ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइच्छा पूरी करने वाला है. जैसे पक्षी पंखों के सहारे तेजी से उड़ता है, उसी प्रकार तुम उस रथ से यज्ञ करने वाले यजमान के पास जाते हो. (१) सुवृद्रथो वर्तते यन्नभि क्षां यत्तिष्ठथः क्रतुमन्तानु पृक्षे. वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में हवि प्राप्त करने के निमित्त यज्ञ की ओर जिस रथ पर सवार होते हो, उसके पहिए सरलता से घूमते चलते हैं. तुम्हारे शरीर का हित करने वाली हमारी स्तुति तुम्हें प्राप्त हो एवं तुम आकाश की पुत्री उषा के साथ मिलन करो. (२) आ तिष्ठतं सुवृतं यो रथो वामनु व्रतानि वर्तते हविष्मान्. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिर्याथस्तनयाय त्मने च.. (३) हे नेता अश्विनीकुमारो! हवि वाले यजमान की ओर जाने वाले अपने उस रथ पर बैठो, जिसके द्वारा तुम यज्ञ में पहुंचना चाहते हो, उसी के द्वारा यजमान को पुत्रलाभ कराने एवं अपना कल्याण करने के लिए यज्ञस्थल में आओ. (३) मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षीन्मा परि वर्क्तमुत माति धक्तम्. अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्राविमे वां निधयो मधूनाम्.. (४) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से हिंसक मादा एवं नर पशु मुझे दुःखी न करें. तुम अपना धनादि दूसरे किसी को मत देना. यह तुम्हारी स्तुति है, यह हव्य का भाग है और यह सोमरस का पात्र है. (४) युवां गोतमः पुरुमीळ्हो अत्रिर्दस्रा हवतेऽवसे हविष्मान्. दिशं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! गौतम, पुरुमीढ एवं अत्रि ऋषि हव्य हाथ में लेकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पथिक मार्ग जानने की इच्छा से दिशा बताने वाले को बुलाता है. आप मेरे आह्वान को सुनकर आइए. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि. एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे कारण अंधकार से पार हो जाएंगे. यह स्तोत्र तुम्हारे लिए ही बनाया गया है. यज्ञरूपी देवमार्ग पर आ जाओ, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (६) सूक्त—१८४ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*