भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 490

सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधरों को नष्ट करने वाले सूर्य पूर्व दिशा में निकलते हैं. वे सभी अदृष्ट विषधारियों एवं राक्षसों को भयभीत करके भगा देते हैं. (८) उदपप्तदसौ सूर्यः पुरु विश्वानि जूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (९) सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधारियों को नष्ट करने वाले सूर्य विषैले जंतुओं को अत्यंत दुर्बल बनाते हुए उदयगिरि से निकलते हैं. (९) सूर्ये विषमा सजामि दृति सुरावतो गृहे. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१०) सुरा बनाने वाला जिस प्रकार चमड़े के पात्र में शराब डालता है, उसी प्रकार मैं विष सूर्य मंडल की ओर फेंकता हूं. जिस प्रकार सूर्य नहीं मरते, उसी प्रकार हम भी न मरें. घोड़ों द्वारा लाए गए सूर्य दूरवर्ती विष को नष्ट कर देते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (१०) इयत्तिका शकुन्तिका सका जघास ते विषम्. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (११) छोटी सी चिड़िया ने तुम्हारा विष खा लिया और नहीं मरी. उसी प्रकार हम भी नहीं मरेंगे. हे विष! घोड़ों द्वारा गमन करने वाले सूर्य दूर से ही विष को नष्ट कर देते हैं. उनकी मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (११) त्रिः सप्त विष्पुलिङ्गका विषस्य पुष्यमक्षन्. ताश्चिन्नु न मरन्ति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१२) अग्नि की सातों जिह्वाओं में सफेद, लाल और काले इस प्रकार मिलकर इक्कीस वर्ण पक्षी के रूप में विष का नाश करते हैं. जब वे नहीं मरते तो हम भी नहीं मरेंगे. अपने घोड़ों द्वारा गमनशील सूर्य दूर रखे विष का नाश करते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुझे अमृत बना देती है. (१२) नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्. सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१३) निन्यानवे नदियां विष नष्ट करने वाली हैं. मैं सबका नाम पुकारता हूं. घोड़ों द्वारा चलने वाले सूर्य दूर रखे विष को भी नष्ट कर देते हैं. हे विष! मधु-विद्या तुझे अमृत बना देगी. (१३) त्रिः सप्त मयूर्यः सप्त स्वसारो अग्रुवः. तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव.. (१४)