ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस समय माता रूप वेदी के समीप भगिनी के समान जुहू नामक पात्र घी से भरकर रखा जाता है, उस समय अध्वर्युस्वरूप अग्नि उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे वर्षा होने पर जौ हरे-भरे हो जाते हैं. (६) स्वः स्वाय धायसे कृणुतामृत्विगृत्विजम्. स्तोमं यज्ञं चादरं वनेमा ररिमा वयम्.. (७) ऋत्विज् रूप अग्नि अपना कर्म समझकर ऋत्विज् का काम करते हैं. हम भी अग्नि की ही कृपा से स्तुतियां, यज्ञ और हव्य पर्याप्त मात्रा में देते हैं. (७) यथा विद्वाँ अरंकरद्विश्वेभ्यो यजतेभ्यः. अयमग्ने त्वे अपि यं यज्ञं चकृमा वयम्.. (८) हे अग्नि! ऐसी कृपा करो कि तुम्हारा महत्त्व जानने वाला यजमान सभी देवों को प्रसन्न कर सके. हे अग्नि! हम जिस यज्ञ को करेंगे, वह तुम्हारा ही होगा. (८) सूक्त—६ देवता—अग्नि इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः. इमा उ षु शृधी गिरः.. (१) हे अग्नि! यज्ञ में दी गई मेरी समिधा तथा आहुति का उपभोग करो एवं मेरी स्तुतियां सुनो. (१) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे. एना सूक्तेन सुजात.. (२) हे अग्नि! इस आहुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करेंगे. हे बल के नाती, विस्तृत यज्ञ के स्वामी एवं सुंदर जन्म वाले अग्नि! इस सुंदर स्तुति द्वारा हम तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (२) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः. सपर्यैम सपर्यवः.. (३) हे धनदाता, स्तुति योग्य एवं हवि के अभिलाषी अग्नि! हम तुम्हारे सेवक बनकर स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (३) स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्. युयोध्य१स्मद् द्वेषांसि.. (४) हे धनस्वामी, विद्वान् एवं धनदाता अग्नि! हमारी स्तुति जानकर हमारे शत्रुओं को भगाओ. (४) स नो वृष्टिं दिवस्परि स नो वाजमनर्वाणम्. स नः सहस्रिणीरिषः.. (५) वे ही अग्नि हमारे कल्याण के लिए आकाश से वर्षा करते हैं एवं पर्याप्त बल तथा हजारों प्रकार के अन्न देते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*