ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनि होता होतृषदने विदानस्त्वेषो दीदिवां असदत्सुदक्षः. अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः.. (१) देवों का आह्वान करने वाले, विद्वान्, चमकते हुए, शोभन बलयुक्त, अहिंसित व्रत एवं उत्तम बुद्धि वाले, निवासस्थान देने वाले, असंख्य व्यक्तियों का भरणपोषण करने वाले एवं विशुद्ध ज्वालाओं वाले अग्नि होता के भवन में भली प्रकार बैठें. (१) त्वं दूतस्त्वमु नः परस्पास्त्वं वस्य आ वृषभ प्रणेता. अग्ने तोकस्य नस्तने तनूनामप्रयुच्छन्दीद्यद्बोधो गोपाः.. (२) हे कामवर्षक! तुम हमारे दूत बनो, हमें आपत्तियों से बचाओ एवं हमारे धनदाता बनो. तुम प्रमादशून्य एवं प्रकाशयुक्त बनकर हमारी और हमारे पुत्रों की शरीर रक्षा करके जगो. (२) विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे. यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवींषि जुहुरे समिद्धे.. (३) हे अग्नि! तुम्हारे उत्तम जन्मस्थान में हम तुम्हारी सेवा करेंगे और तुम्हारे आकाश से नीचे स्थित होने पर स्तुतिसमूहों से तुम्हें प्रसन्न करेंगे. जिस अधःप्रदेश अर्थात् धरती से तुम उत्पन्न हुए हो, उसकी भी पूजा करेंगे. वहां जब तुम प्रज्वलित होते हो तो अध्वर्यु हव्य देते हैं. (३) अग्ने यजस्व हविषा यजीयान् शृष्टी देष्णमभि गृणीहि राधः. त्वं ह्यसि रयिपती रयीणां त्वं शुक्रस्य वचसो मनोता.. (४) हे श्रेष्ठ याज्ञिक रूप अग्नि! तुम हव्य द्वारा यज्ञ करो और शीघ्रतापूर्वक हमारे दान योग्य अन्न की प्रशंसा देवों के सामने करो. तुम उत्तम धनों के स्वामी हो. तुम हमारे ओजस्वी स्तोत्र को जानो. (४) उभयं ते न क्षीयते वस्वयं दिवेदिवे जायमानस्य दस्म. कृधि क्षुमन्तं जरितारमग्ने कृधि पतिं स्वपत्यस्य रायः.. (५) हे सुंदर अग्नि! प्रतिदिन उत्पन्न होने वाला तुम्हारा दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार का धन नष्ट नहीं होता. हे अग्नि! स्तुतिकर्त्ता यजमान को अन्न का स्वामी बनाओ एवं उसे अपत्यों वाला धन प्रदान करो. (५) सैनानीकेन सुविद्त्रो अस्मे यष्टा देवाँ आयजिष्ठः स्वस्ति. अदब्धो गोपा उत नः परस्पा अग्ने द्युमदुत रेवद्दिदीहि.. (६) हे अग्नि! तुम अपनी सेना सहित आकर हमारे लिए शोभन धन वाले बनो. हे देवों के ebook converter DEMO Watermarks*