भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 1855 में से

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उग्रोष्विन्नु शूर मन्दसानस्त्रिकद्रुकेषु पाहि सोममिन्द्र. प्रदोधुवच्छ्मश्रुषु प्रीणानो याहि हरिभ्यां सुतस्य पीतिम्.. (१७) हे शूर इंद्र! तुम त्रिकंदु नामक उग्र दिनों में प्रसन्न होते हुए सोमरस पिओ. इसके बाद प्रसन्न होते हुए एवं अपनी दाढ़ी में लगी सोमरस की बूंदों को बार-बार झाड़ते हुए अपने घोड़ों द्वारा सोमरस पीने के विचार से दूसरी जगह जाओ. (१७) धिष्वा शवः शूर येन वृत्रमवाभिनद्दानुमौर्णवाभम्. अपावृणोर्ज्योतिरार्याय नि सव्यतः सादि दस्युरिन्द्र.. (१८) हे शूर इंद्र! वह बल धारण करो, जिसके द्वारा तुमने दनुपुत्र वृत्र को मकड़ी के समान मसल डाला था. तुमने आर्यों के लिए प्रकाश का उद्घाटन किया एवं दस्यु तुम्हारे द्वारा सताए गए. (१८) सनेम ये त ऊतिभिस्तरन्तो विश्वाः स्पृध आर्येण दस्यून्. अस्मभ्यं तत्त्वाष्ट्रं विश्वरूपमरन्धयः साख्यस्य त्रिताय.. (१९) हम उन लोगों की प्रशंसा करते हैं, जो तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर सभी से उत्तम सिद्ध हुए एवं जिन्होंने आर्य बनकर दस्युजनों पर विजय पाई. जिस प्रकार तुमने त्रित का सखा बनकर त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का वध किया, वैसा ही कार्य हमारे लिए भी करो. (१९) अस्य सुवानस्य मन्दिनस्त्रितस्य न्यर्बुदं वावृधानो अस्तः. अवर्तयत्सूर्यो न चक्रं भिनद्वलमिन्द्रो अङ्गिरस्वान्.. (२०) इंद्र ने प्रसन्न एवं सोम निचोड़ने वाले त्रित द्वारा उन्नति पाकर अर्बुद को नष्ट किया था. सूर्य जिस प्रकार अपने रथ के पहिए को आगे चलाते हैं, उसी प्रकार अंगिराओं की सहायता पाकर इंद्र ने अपना वज्र चलाया और बल का नाश किया. (२०) नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी. शिक्षा स्तोतृभ्यो मति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (२१) हे इंद्र! तुम्हारी जो धनयुक्त दक्षिणा स्तोता की इच्छा पूरी करती है, वह हमें प्रदान करो. तुम सेवा करने योग्य हो, इसलिए हमारे अतिरिक्त वह दक्षिणा किसी को मत देना. हम पुत्र- पौत्र आदि को साथ लेकर इस यज्ञ में तुम्हारी अधिक स्तुति करेंगे. (२१) सूक्त—१२ देवता—इंद्र यो जात एव प्रथमो मनस्वान्देवो देवान्क्रतुना पर्यभूषत्. यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नृम्णस्य मह्ना स जनास इन्द्रः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*