भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 1855 में से

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जो यजमान आदित्यों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह शुचि, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, अधिक अन्न का स्वामी, शोभन पुत्रों वाला एवं सुंदर फसलों का मालिक बनकर जल के समीप निवास करता है. समीप या दूर रहने वाला कोई भी शत्रु उसकी हिंसा नहीं कर सकता. (१३) अदिते मित्र वरुणोत मृळ यद्वो वयं चकृमा कच्चिदागः. उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्त्राः.. (१४) हे अदिति, मित्र एवं वरुण! यदि हम तुम्हारे प्रति कोई अपराध करें तो उससे हमारी रक्षा करना. हे इंद्र! हम विस्तृत एवं भयरहित ज्योति प्राप्त करें. अंधेरी रात हमें व्याप्त न करे. (१४) उभे अस्मै पीपयतः समीची दिवो वृष्टिं सुभगो नाम पुष्यन्. उभा क्षयावाजयन्याति पृत्सूभावर्धौ भवतः साधू अस्मै.. (१५) जो यजमान अदितिपुत्रों के मार्ग पर चलता है, उसकी वृद्धि धरती-आकाश दोनों मिलकर करते हैं. वह भाग्यशाली आकाश का जल प्राप्त करके वृद्धि करता है एवं युद्ध में शत्रुओं को हरा कर अपने और उनके दोनों निवासस्थान प्राप्त करता है. संसार के चर और अचर दोनों भाग उसके लिए मंगलकारक होते हैं. (१५) या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः. अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम.. (१६) हे यज्ञ योग्य आदित्यो! तुमने जो माया द्रोहकारी राक्षसों के लिए एवं जो पाश शत्रुओं के लिए बनाए हैं, हम उन्हें अश्वारोही के समान रथ से लांघ जावें. हम शत्रुओं द्वारा अहिंसित होकर महान् सुख प्राप्त करें. (१६) माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः. मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१७) हे वरुण! मैं किसी धनी एवं अधिक दानी व्यक्ति के सम्मुख अपनी दरिद्रता की बात न कहूं. हे दीप्तिमान् वरुण! हमें कभी भी आवश्यक धन की कमी न रहे. हम शोभन धन प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (१७) सूक्त—२८ देवता—वरुण इदं कवेरादित्यस्य स्वराजो विश्वानि सान्त्यभ्यस्तु मह्ना. अति यो मन्द्रो यजथाय देवः सुकीर्तिं भिक्षे वरुणस्य भूरेः.. (१)