ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्ति की प्रशंसा करते हैं. हम उससे वीर संतान पाकर प्रतिदिन उत्तम धन का उपभोग कर सकें. (११) सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव अस्माकं मित्रावरुणावतं रथमादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा. प्र यद्द्यो न पप्तन्वस्मनस्परि श्रवस्यवो हृषीवन्तो वनर्षदः.. (१) हे मित्र एवं वरुण! जब हमारा रथ अन्न के इच्छुक, हर्षयुक्त एवं वनवासी पक्षियों के समान हमारे निवासस्थान से दूसरे स्थान को जाये, तब तुम आदित्यों, रुद्रों तथा वसुओं के साथ मिलकर उस रथ की रक्षा करना. (१) अध स्मा न उदवता सजोषसो रथं देवासो अभि विक्षु वाजयुम्. यदाश्वः पद्भाभिस्तिष्ठतो रजः पृथिव्याः सानौ जङ्घनन्त पाणिभिः.. (२) हे समान रूप से प्रसन्न देवो! इस समय जनपदों में अन्न की खोज में गए हुए हमारे रथ को गतिशील बनाओ, क्योंकि इस रथ में जुड़े हुए घोड़े अपनी गतियों से मार्ग तय करते हैं एवं उठी हुई धरती पर अपने खुरों से बहुत तेज चलते हैं. (२) उत स्य न इन्द्रो विश्वचर्षणिर्दिवः शर्धेन मारुतेन सुक्रतुः. अनु नु स्थात्यवृकाभिरूतिभी रथं महे सनये वाजसातये.. (३) अथवा समस्त लोक को देखने वाले एवं मरुद्गण की शक्ति से उत्तम कर्म करने वाले इंद्र हिंसारहित रक्षासाधनों के साथ स्वर्ग से आकर अधिक धन और अन्न को पाने के लिए अनुकूल बनें. (३) उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम्. इळा भगो बृहद्दिवोत रोदसी पूषा पुरन्धिरश्विनावधा पती.. (४) अथवा संपूर्ण विश्व के पूज्य त्वष्टा देव देवपत्नियों के साथ मिलकर प्रेमपूर्वक हमारे उक्त रथ को आगे बढ़ावें. इड़ा, परम तेजस्वी भग, धरती आकाश, परमबुद्धियुक्त पूषा एवं सूर्या के पति अश्विनीकुमार हमारा रथ चलाएं. (४) उत त्ये देवी सुभगे मिथूदृषोषासानक्ता जगतामपीजुवा. स्तुषे यद्वां पृथिवि नव्यसा वचः स्थात्तुश्च वयस्त्रिवया उपस्तिरे.. (५) अथवा प्रसिद्ध देवियां, सुंदर, एक-दूसरे को देखने वाली एवं चलने वाले जीवों की प्रेरक उषा और निशा हमारे रथ को चलावें. हे धरती और आकाश! मैं तुम्हारी नवीन वचनों से स्तुति करता हूं एवं ओषधि, सोम तथा पशु तीन प्रकार के अन्नों के साथ स्थावर हव्य प्रदान ebook converter DEMO Watermarks*