भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 564

हे नेता इंद्र और वायु! तुम आज नियुतं के साथ गव्य मिले सोम पीने के लिए आओ. (३) अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा. ममेदिह श्रुतं हवम्.. (४) हे यज्ञवर्द्धक मित्र एवं वरुण! तुम्हारे लिए यह सोम निचोड़ा गया है. तुम हमारी पुकार सुनो. (४) राजानावनभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे. सहस्रस्थूण आसाते.. (५) शत्रुरहित एवं दीप्तिमान् मित्र व वरुण! ध्रुव, ऊंचे और हजार खंभों वाले इस स्थान में बैठो. (५) ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती. सचेते अनवह्वरम्.. (६) सबके शासक, घृत रूपी अन्न का भोजन करने वाले, अदितिपुत्र व दानशील मित्र तथा वरुण यजमान की सेवा करते हैं. (६) गोमदू षु नासत्याश्वावद्यातामश्विना. वर्ती रुद्रा नृपाय्यम्.. (७) हे सत्यवादी अश्विनीकुमारो एवं रुद्रो! यज्ञ के नेता देवों के पीने योग्य सोम को गायों तथा अश्वों से युक्त करके अपने मार्ग से लाओ. (७) न यत्परो नान्तर आदधर्षद्वृषण्वसू. दुःशंसो मर्त्यो रिपुः.. (८) हे धनवर्षक अश्विनीकुमारो! हमें ऐसा धन दो, जिसे न दूरवर्ती और न समीपवर्ती शत्रु मनुष्य चुरा सके. (८) ता न आ वोळ्हमश्विना रयिं पिशङ्कसन्दृशम्. धिष्ण्या वरिवोविदम्.. (९) हे जानने योग्य अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पास नाना रूप एवं धनलाभकारी पशु लाओ. (९) इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत्. स हि स्थिरो विचर्षणिः.. (१०) इंद्र पराभवकारी महान् भय दूर करते हैं, इसलिए वे अचंचल एवं विश्वद्रष्टा हैं. (१०) इन्द्रश्च मृळयाति नो न नः पश्चादघं नशत्. भद्रं भवाति नः पुरः.. (११) इंद्र यदि हमें सुखी रखेंगे तो पाप हमारे समीप नहीं आएगा एवं हमारे सम्मुख कल्याण उपस्थित होगा. (११) इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत्. जेता शत्रून्विचर्षणिः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*