ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे शक्तिशाली एवं उत्तम कर्म वाले अग्नि! तुम सदैव रमण करते हुए हमारे यज्ञ को देवों के समीप पहुंचाओ. हे देवों के होता अग्नि! हमें अन्न एवं अधिक धन दो. (२२) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (२३) हे अग्नि! मुझ होता को मेरे कर्मों के अनुकूल गाय प्रदान करने वाली स्थायी भूमि दो. मेरा पुत्र संतान का विस्तार करने वाला हो. मेरे प्रति तुम्हारी उत्तम बुद्धि हो. (२३) सूक्त—२ देवता—वैश्वानर अग्नि वैश्वानराय धिषणामृतावृधे घृतं न पूतमग्नये जनामति. द्विता होतारं मनुषश्च वाघतो धिया रथं न कुलिशः समृण्वति.. (१) हम जल बढ़ाने वाले वैश्वानर को लक्ष्य करके युद्ध के समान आनंदप्रद स्तुतियां करते हैं. जैसे वसूला रथ को बनाता है, उसी प्रकार यजमान और ऋत्विज् गार्हपत्य एवं आह्वानीय दो प्रकार के देव-आह्वाता अग्नि का मैं संस्कार करता हूं. (१) स रोचयज्जन्मुषा रोदसी उभे स मात्रोरभवत्पुत्र ईड्यः. हव्यवाळग्निरजरश्चनोहितो दूळभो विशामतिथिर्विभावसुः.. (२) अग्नि ने उत्पन्न होते ही धरती और आकाश को प्रकाशित किया एवं अपने माता-पिता के प्रशंसनीय पुत्र बने. हव्य वहन करने वाले, यजमान को अन्न देने वाले, अधृष्य एवं प्रभावयुक्त अग्नि इस प्रकार पूज्य हैं जैसे मनुष्य अतिथि की पूजा करते हैं. (२) क्रत्वा दक्षस्य तरुषो विधर्मणि देवासो अग्निं जनयन्त चित्तिभिः. रुरुचानं भानुना ज्योतिषा महामत्यं न वाजं सनिष्यन्नुप ब्रुवे.. (३) ज्ञानयुक्त देवगण ने व्यसनों से छुड़ाने वाले बल द्वारा यज्ञ में अग्नि को उत्पन्न किया. मैं अन्न की अभिलाषा से भासमान ज्योति द्वारा चमकने वाले महान् अग्नि की स्तुति भारवाही अश्व के समान करता हूं. (३) आ मन्द्रस्य सनिष्यन्तो वरेण्यं वृणीमहे अह्रयं वाजमृग्मियम्. रातिं भृगूणामुशिजं कविक्रतुमग्निं राजन्तं दिव्येन शोचिषा.. (४) मैं स्तुति योग्य वैश्वानर अग्नि से संबंधित, उत्तम, लज्जा न उत्पन्न करने वाले एवं प्रशंसनीय अन्न की अभिलाषा करता हुआ भृगुवंशी ऋषियों की इच्छा पूर्ण करने वाले, सबके प्रिय, क्रांतदर्शी एवं दिव्य ज्योति से सुशोभित अग्नि की सेवा करता हूं. (४) अग्निं सुम्नाय दधिरे पुरो जना वाजश्रवसमिह वृक्तबर्हिषः. ebook converter DEMO Watermarks*