ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइच्छा करते हुए अग्नि दीप्तियुक्त, भली प्रकार स्तुत एवं अपने प्रिय स्थान पर स्थित हैं. दीप्तिमान्, पवित्र, दर्शनीय एवं महान् अग्नि अपने माता-पितारूप धरती और आकाश को अधिक नया बनाते हैं. (७) सद्यो जात ओषधीभिर्ववक्षे यदी वर्धन्ति प्रस्वो घृतेन. आप इव प्रवता शुम्भमाना उरुष्यदग्निः पित्रोरुपस्थे.. (८) तुरंत उत्पन्न अग्नि को ओषधियां धारण करती हैं. उस समय बहने के मार्ग पर जाने वाले जल के समान सुशोभित वे ओषधियां फल देती हुई जल के द्वारा बढ़ती हैं. माता- पितारूप धरती एवं आकाश की गोदी में बढ़ते हुए अग्नि हमारी रक्षा करें. (८) उदु ष्टुतः समिधा यह्वो अद्यौद्धर्म्मन्दिवो अधि नाभा पृथिव्याः. मित्रो अग्निरीड्यो मातरिश्वा दूतो वक्षद्यजथाय देवान्.. (९) हमारे द्वारा स्तुत एवं प्रज्वलित होने के कारण महान् अग्नि उत्तर वेदी के मध्यभाग में आकाश को प्रकाशित करते हैं. सबके मित्र, स्तुति-योग्य एवं अरणि से उत्पन्न होने वाले अग्नि देवों के दूत बनकर उन्हें यज्ञ के निमित्त बुलावें. (९) उदस्तम्भीत्समिधा नाकमृष्वोऽग्निर्भवन्नुत्तमो रोचनानाम्. यदी भृगुभ्यः परि मातरिश्वा गुहा सन्तं हव्यवाहं समीधे.. (१०) जब मातरिश्वा अर्थात् वायु ने भृगुवंशी ऋषियों के लिए गुहा में स्थित हव्यवाहक अग्नि को जलाया था, तब महान् एवं तेजस्वियों में उत्तम अग्नि ने अपने तेज द्वारा स्वर्ग को दृढ़ बना दिया था. (१०) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (११) हे अग्नि! तुम स्तोताओं को सदा ऐसी भूमि दो, जिसे पाकर वे बहुत से यज्ञकर्म करते हुए गाय पा सकें. हमें ऐसा एक पुत्र दो जो हमारे वंश का विस्तार करे एवं संतान को उत्पन्न करे. हमारे प्रति तुम्हारी शोभन बुद्धि रहे. (११) सूक्त—६ देवता—अग्नि प्र कारवो मनना वच्यमाना देवद्रीचीं नयत देवयन्तः. दक्षिणावाड्वाजिनी प्राच्येति हविर्भरन्त्यग्नये घृताची.. (१) हे यज्ञकर्त्ताओं! तुम देवों की कामना करते हुए मंत्रों से प्रेरित होकर देवों की अर्चना करने वाला स्रुच भली प्रकार लाओ. वह आहवनीय यज्ञ की दक्षिण दिशा में ले जाया जाता ebook converter DEMO Watermarks*