भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 1855 में से

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नीली पीठ वाले एवं सबके धारणकर्त्ता अग्नि की अत्यंत ऊपर उठने वाली किरणें माता-पितारूप धरती-आकाश एवं सातों नदियों में सभी ओर से प्रवेश करती हैं. माता- पितारूप धरती और आकाश भली-भांति विस्तृत हैं एवं अधिक मात्रा में यज्ञ करने के लिए अग्नि दीर्घ-आयुरूप अन्न देते हैं. (१) दिवक्षसो धेनवो वृष्णो अश्वा देवीरा तस्थौ मधुमद्दुहन्तीः. ऋतस्य त्वा सदसि क्षेमयन्तं पर्येका चरति वर्त्तनिं गौः.. (२) आकाश में रहने वाली सूर्यकिरणरूप गाएं कामवर्षी अग्नि के घोड़े हैं. मधुर जल वाली दिव्य नदियों में अग्नि का वास है. हे उदक के स्थान में निवास के इच्छुक एवं ज्वालाएं प्रदान करने वाले अग्नि! माध्यमिका वाणीरूप गाएं तुम्हारी सेवा करती हैं. (२) आ सीमरोहत्सुयमा भवन्तीः पतिश्चिकित्वान्प्रयिविद्गयीणाम्. प्र नीलपृष्ठो अतसस्य धासेस्ता अवासयत्पुरुधप्रतीकः.. (३) उत्तम संपत्तियों एवं ज्ञानसंपन्न अश्वों के स्वामी अग्नि जिन घोड़ियों पर चढ़ते हैं, उन्हें सुख से वश में किया जा सकता है. नीली पीठ वाले एवं चारों ओर विस्तृत अग्नि ने घोड़ियों को सदा चलने के लिए छोड़ दिया है. (३) महि त्वाष्ट्रमूर्जयन्तीरजूर्य स्तभूयमानं वहतो वहन्ति. व्यङ्गेभिर्विद्युतानः सधस्थ एकामिव रोदसी आ विवेश.. (४) निर्बल को बलवान् बनाने वाली नदियां महान्, त्वष्टा के पुत्र, जरारहित एवं लोकों को धारण करने के इच्छुक अग्नि को वहन करती हैं. जलों के समीप अपने अवयवों से प्रकाशित होते हुए अग्नि धरती-आकाश में उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार पुरुष नारी के समीप जाता है. (४) जानन्ति वृष्णो अरुषस्य शेवमृत ब्रध्नस्य शासने रणन्ति. दिवोरुचः सुरुचो रोचमाना इळा येषां गण्या माहिना गीः.. (५) मनुष्य कामवर्षी एवं शत्रुहीन अग्नि के आश्रय से मिलने वाले सुख को जानते हैं, इसीलिए महान् अग्नि की आज्ञा पालने में प्रसन्न रहते हैं. जिन मनुष्यों की अग्नि-स्तुतिरूपी वाणी उत्तम होती है, वे स्वर्ग को प्राप्त करने वाले, उत्तम दीर्घायुयुक्त एवं तेजस्वी बनते हैं. (५) उतो पितृभ्यां प्रविदानु घोषं महो महद्द्यामयनन्त शूषम्. उक्षा ह यत्र परि धानमुक्तोरनु स्वं धाम जरितुर्ववक्ष.. (६) अग्नि के माता-पितारूप महत्तम धरती और आकाश के ज्ञान के पश्चात् उच्च स्वर से की गई स्तुति का सुख यजमान अग्नि के पास पहुंचाते हैं. अग्नि उस सुख को वर्षा के द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*