ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निं सूनुं सनश्रुतं सहसो जातवेदसम्. वह्निं देवा अकृण्वत.. (४) बल के पुत्र, सनातन रूप से प्रसिद्ध तथा जातवेद अग्नि को देवों ने हव्य ढोने वाला बनाया है. (४) अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्. तूर्णी रथः सदा नवः.. (५) मानवी प्रजाओं के अग्रगामी, शीघ्रता करने वाले, रथ के समान द्रव्य ढोने वाले एवं नित्य नवीन अग्नि का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता. (५) साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानामामृक्तः. अग्निस्तुविश्रवस्तमः.. (६) समस्त शत्रुसेना को पराजित करने वाले, शत्रुओं द्वारा अवध्य एवं देवों के पोषक अग्नि अनेक प्रकार के अन्नों से युक्त हैं. (६) अभि प्रयांसि वाहसा दाश्वां अश्नोति मर्त्यः. क्षयं पावकशोचिषः.. (७) हव्य देने वाला मनुष्य हव्यवहन करने वाले अग्नि की कृपा से समस्त अन्नों को प्राप्त करता है एवं पवित्र प्रकाश वाले अग्नि से घर पाता है. (७) परि विश्वानि सुधिताग्नेरश्याम मन्मभिः. विप्रासो जातवेदसः.. (८) हम प्रजासंपन्न एवं ज्ञानवान् होता आदि तुझ अग्नि के स्तोत्रों द्वारा समस्त हितकारक धन प्राप्त करें. (८) अग्ने विश्वानि वार्या वाजेषु सनिषामहे. त्वे देवास एरिरै.. (९) हे अग्नि! समस्त देव तुम्हीं में प्रविष्ट हैं, इसलिए हम यज्ञों में तुमसे समस्त उत्तम धन प्राप्त करें. (९) सूक्त—१२ देवता—इंद्र एवं अग्नि इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्यं पातं धियेषिता.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! हमारी स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम शुद्ध किए हुए एवं उत्तम सोमरस को लक्ष्य करके स्वर्ग से यहां आओ एवं हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्म में इसे पिओ. (१) इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमिमं सुतम्.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! स्तोता का सहायक, यज्ञ का साधन एवं इंद्रियों को आनंदित करने ebook converter DEMO Watermarks*