भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 1855 में से

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सूक्त—२२ देवता—अग्नि अयं सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः. सहस्रिणं वाजमत्यं न सप्तिं ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (१) यह वही अग्नि है, जिस में अभिषुत सोमरस को कामना करने वाले इंद्र ने अपने उदर में रखा था. हे जातवेद अग्नि! हजार रूपों वाले अश्व के समान वेगशाली एवं हव्य का सेवन करने वाले तुम्हारी स्तुति सारा संसार करता है. (१) अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र. येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (२) हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम्हारा जो तेज आकाश, धरती, ओषधियों एवं जल में है, जिस तेज के द्वारा तुमने अंतरिक्ष को विस्तृत किया है, वह तेज आसमान, दीप्तिमान् सागर के समान विस्तृत एवं मनुष्यों के लिए दर्शनीय है. (२) अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ ऊचिषे धिष्ण्या ये. या रोचने परस्तात्सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः.. (३) हे अग्नि! तुम आकाश में व्याप्त जल को लक्ष्य करके जाते हो एवं प्राण संयुक्त देवों को एकत्र करते हो. सूर्य के ऊपर रोचन नामक लोक में तथा सूर्य के नीचे जो जल वर्तमान हैं, उन्हें तुम्हीं प्रेरणा देते हो. (३) पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः. जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवा इषो महीः.. (४) बालू मिली हुई अग्नियां खुदाई के काम आने वाले औजारों से मिलकर इस यज्ञ का सेवन करें तथा हमारे प्रति द्रोहरहित होकर हमें रोगरहित महान् अन्न दें. (४) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५) हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधन रूप गौ प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो. (५) सूक्त—२३ देवता—अग्नि निर्मथितः सुधित आ सधस्थे युवा कविरध्वरस्य प्रणेता. ebook converter DEMO Watermarks*