ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर्वताकार मेघों को कंपित करते हैं. (४) अग्निश्रियो मरुतो विश्वकृष्टय आ त्वेषमुग्रमव ईमहे वयम्. ते स्वानिनो रुद्रिया वर्षनिर्णिजः सिंहा न हेषक्रतवः सुदानवः.. (५) अग्नि के आश्रित एवं वृक्षों को आकर्षित करने वाले मरुतों का उज्ज्वल एवं सशक्त आश्रय पाने के लिए हम याचना करते हैं. वे रुद्रपुत्र मरुद्गण वर्षा का रूप धारण करने वाले, हिनहिनाते हुए, सिंह के समान गर्जनकारी तथा शोभन जल देने वाले हैं. (५) व्रातंव्रातं गणंगणं सुशस्तिभिरग्नेर्भमं मरुतामोज ईमहे. पृषदश्वासो अनवभ्रराधसो गन्तारो यज्ञं विदथेषु धीराः.. (६) हम बहुत से स्तुति मंत्रों द्वारा अग्नि के तेज और मरुतों के ओज की याचना करते हैं. बुंदकियों से युक्त घोड़ों वाले, संपूर्ण धनयुक्त एवं धीर मरुद्गण यज्ञ में हवि को लक्ष्य करके जाते हैं. (६) अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्. अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम.. (७) हे कुशिकगोत्रीय ब्राह्मणो! मैं जन्म से ही सर्वज्ञ अग्नि हूं. घृत मेरा नेत्र है तथा अमृत मेरे मुख में रहता है. मेरे प्राण तीन प्रकार के हैं. मैं आकाश को नापने वाला, नित्यप्रकाशयुक्त एवं हव्यरूप हूं. (७) त्रिभिः पवित्रैरपुपोद्ध्यार्कं हृदा मतिं ज्योतिरनु प्रजानन्. वर्षिष्ठं रत्नमकृत स्वधाभिरादिद् द्यावापृथिवी पर्यपश्यत्.. (८) अग्नि ने मन से सुंदर ज्योति को अच्छी तरह जानकर स्वयं को तीन पवित्र रूपों में शुद्ध किया. उन रूपों द्वारा स्वयं को परम रमणीय बनाया तथा इसके पश्चात् धरती और आकाश को देखा. (८) शतधारमुत्समक्षीयमाणं विपश्चितं पितर वक्त्यानाम्. मेळिं मदन्तं पित्रोरुपस्थे तं रोदसी पिपृतं सत्यवाचम्.. (९) हे धरती और आकाश! सौ धाराओं वाले सोते के समान कभी क्षीण न होने वाले, मेधावी, पालनकर्त्ता, वेदवाक्यों का एकत्र संग्रह करने वाले, माता-पिता के समीप प्रसन्नचित्त एवं सत्यवादी उस उपाध्याय को संपूर्ण करो. (९) सूक्त—२७ देवता—अग्नि प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या. देवाञ्जिगाति सुम्नयुः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*