ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 638, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्र सोमाः सुता इमे तान्दधिश्व शतक्रतो. जठरे वाजिनीवसो.. (५) हे शतक्रतु इंद्र एवं अन्नरूपी धन वाले इंद्र! ये सोम निचोड़े गए हैं. इन्हें अपने उदर में धारण करो. (५) विद्या हि त्वा धनञ्जयं वाजेषु दधृषं कवे. अधा ते सुम्नमीमहे.. (६) हे क्रांतदर्शी इंद्र! हम तुम्हें युद्धों में शत्रुओं को हराने वाला एवं धन जीतने वाला जानते हैं, इसलिए तुमसे धन मांगते हैं. (६) इममिन्द्र गवाशिरं यवाशिरं च नः पिब. आगत्या वृषभिः सुतम्.. (७) हे इंद्र! यज्ञस्थल में आकर गोदुग्ध एवं जौ मिले हुए तथा पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम को पिओ. (७) तुभ्येदिन्द्र स्व ओक्ये३ सोमं चोदामि पीतये. एष रारन्तु ते हृदि.. (८) हे इंद्र! तुम्हारे पीने के लिए ही हम इस सोम को अपने उदर की ओर प्रेरित करते हैं. यह सोम तुम्हारे हृदय में रमण करे. (८) त्वां सुतस्य पीतये प्रत्नमिन्द्र हवामहे. कुशिकासो अवस्यवः.. (९) हे पुरातन इंद्र! तुमसे रक्षा की अभिलाषा करते हुए हम कुशिकगोत्रीय ऋषि स्तुति वाक्यों द्वारा तुम्हें सोम पीने के लिए बुलाते हैं. (९) सूक्त—४३ देवता—इंद्र आ याह्यर्वाङुप वन्धुरेष्ठास्तवेदनु प्रदिवः सोमपेयम्. प्रिया सखाया वि मुचोप बर्हिस्त्वामिमे हव्यवाहो हवन्ते.. (१) हे जुए वाले रथ पर बैठे हुए इंद्र! तुम शीघ्र हमारे पास आओ. यह सोमपान प्राचीनकाल से तुम्हारे निमित्त ही चला आ रहा है. तुम अपने प्यारे घोड़ों को कुश के निकट रथ से खोलो. ये ऋत्विज् तुम्हें सोम पीने के लिए बुलाते हैं. (१) आ याहि पूर्वीरति चर्षणीरां अर्य आशिष उप नो हरिभ्याम्. इमा हि त्वा मतयः स्तोमतष्टा इन्द्र हवन्ते सख्यं जुषाणाः.. (२) हे स्वामी इंद्र! तुमसे हमारी यही प्रार्थना है कि सभी पूर्ववर्ती प्रजाओं को छोड़कर हमारे समीप आओ और अपने घोड़ों के साथ यहां सोमरस पिओ. स्तोताओं द्वारा निर्मित एवं तुम्हारी मित्रता चाहने वाली स्तुतियां तुम्हें बुलाती हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*