भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 1855 में से

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ने यज्ञकर्म के हेतु अग्नि को बनाया है. आकाश उसका जनक तथा पालनकर्त्ता है एवं अध्वर्यु घी की आहुतियों से उसे सींचते हैं. (१०) स जायत प्रथमः पस्त्यासु महो बुध्ने रजसो अस्य योनौ. अपादशीर्षा गुहमानो अन्तायोयुवानो वृषभस्य नीळे.. (११) श्रेष्ठ अग्नि यजमानों के घरों एवं विशाल आकाश की मूलरूपी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं. बिना पैर और सिर वाले अग्नि अपने शरीर को छिपाकर बादल के घर अर्थात् आकाश में धुएं का रूप धारण करते हैं. (११) प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याँ ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे. स्पार्हो युवा वपुष्यो विभावा सप्त प्रियासोऽजनयन्त वृष्णे.. (१२) हे अग्नि! स्तुतिसंपन्न जल के उत्पत्ति स्थान एवं बादलों के घोंसले के तुल्य आकाश में बिजली के रूप में वर्तमान तुम्हारे पास तेज सबसे पहले पहुंचता है. सात प्रिय होता अभिलाषा करने योग्य, अत्यंत सुंदर एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि को लक्ष्य करके स्तुति करते हैं. (१२) अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशूषाणः. अश्मव्रजाः सुदुघा वव्रे अन्तरुदुस्रा आजन्नुषसो हुवानाः.. (१३) इस लोक में हमारे पूर्वज अंगिरा यज्ञ करते हुए अग्नि के सामने गए थे. उन्होंने उषाओं का आह्वान करते हुए पर्वत की गुफा में वर्तमान, अंधकार में स्थित एवं पणियों द्वारा चुराई गई दुधारू गायों को प्राप्त किया था. (१३) ते मर्मृजत दद्वांसो अद्रिं तदेषामन्ये अभितो वि वोचन्. पश्वयन्त्रासो अभि कारमर्चन्विदन्त ज्योतिश्चकृपन्त धीभिः.. (१४) उन अंगिराओं ने गायों को छिपाने वाले पर्वत को तोड़ते हुए अग्नि की सेवा की. अन्य ऋषियों ने उनका यह कार्य सभी जगह कहा. पशुओं के निकलने के उपाय जानने हेतु अंगिराओं ने अभिमत फल देने वाले अग्नि की स्तुति करते हुए प्रकाश पाया एवं अपने बुद्धिबल से यज्ञ किया. (१४) ते गव्यता मनसा दृध्रमुब्धं गा येमानं परि षन्तमद्रिम्. दृळ्हं नरो वचसा दैव्येन व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (१५) यज्ञकर्मों के नेता एवं अग्नि की कामना करने वाले अंगिराओं ने गायों को पाने के विचार से दृढ़बंद, गायों को रोकने वाले, चारों ओर फैले हुए, कठोर, गायों से युक्त एवं गोशाला के समान पर्वत को अग्नि संबंधी स्तुतियों से उद्घाटित कर दिया था. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*