भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 752, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 752

के मध्य कौन सा देव हमारा अधिक कल्याण करेगा? शीघ्र दौड़ने वाला रथ कौन सा है, जिसने सूर्य की पुत्री का वरण पाया है? तात्पर्य यह है कि उक्त गुण केवल अश्विनीकुमारों में ही हैं। (२) मक्षू हि ष्मा गच्छथ ईवतो द्यूनिन्द्रो न शक्तिं परितक्म्यायाम्. दिव आजाता दिव्या सुपर्णा कया शचीनां भवथः शचिष्ठा.. (३) रात्रि बीतने पर इंद्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों उसी प्रकार गतिशील होकर सोम निचोड़ने वाले दिवसों में शीघ्र आओ. स्वर्ग से आए हुए, दिव्य गुणयुक्त एवं शोभन गति वाले तुम दोनों के कर्मों में कौन सा कर्म श्रेष्ठ है? (३) का वां भूदुपमातिः कया न आश्विना गमथो हूयमाना. को वां महश्चित्यजसो अभीक उरुष्यतं माध्वी दसा न ऊती.. (४) कौन सी स्तुति तुम दोनों के गुणों की सीमा हो सकती है? हे अश्विनीकुमारो! किस स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम दोनों हमारे पास आओगे? तुम्हारे महान् क्रोध को समीप में कौन सह सकता है? हे जल निर्माता एवं शत्रुनाशकारी अश्विनीकुमारो! हमारी रक्षा करो. (४) उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्. मध्वा माध्वी मधु वां पृषायन्त्सीं वां पृक्षो भुरजन्त पक्वाः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों का रथ स्वर्गलोक के चारों ओर भली प्रकार चलता है एवं समुद्र से तुम्हारे पास आता है. हे जल-निर्माता एवं शत्रुविनाशक अश्विनीकुमारो! अध्वर्यु लोग मधुर दूध के साथ सोमरस मिलाते हुए भुने हुए जौ लेकर उपस्थित हैं. (५) सिन्धुर्ह वां रसया सिञ्चदश्वान्घृणा वयोऽरुषासः परि ग्मन्. तदू षु वामजिरं चेति यानं येन पती भवथः सूर्यायाः.. (६) बादल ने अपने जल से तुम दोनों के घोड़ों को भिगोया था. तुम्हारे दीप्तियुक्त घोड़े पक्षियों के समान तेज चलते हैं. तुम्हारा वह रथ भली प्रकार प्रसिद्ध है, जिस पर तुम सूर्यपुत्री को बैठाकर लाए थे. (६) इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना. उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७) हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७) सूक्त—४४ देवता—अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*