ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 786, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्नि! तुम अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के यश के द्वारा प्रसन्न बनो. (४) त्वमग्ने पुरुरूपो विशोविशे वयो दधासि प्रत्नथा पुरुष्टुत. पुरूण्यन्ना सहसा वि राजसि त्विषिः सा ते तित्त्विषाणस्य नाधृषे.. (५) हे अनेक रूपधारी अग्नि! तुम प्राचीन काल के समान सभी यजमानों को धन देते हो. हे बहुतों द्वारा स्तुत अग्नि! तुम अपनी शक्ति से ही बहुत से अन्नों के स्वामी बनते हो. तुझ दीप्तिशाली की दीप्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता. (५) त्वामग्ने समिधानं यविष्ठ्य देवा दूतं चक्रिरे हव्यवाहनम्. उरुञ्जयसं घृतयोनिमाहुतं त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्मति.. (६) हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित बनो. देवों ने तुम्हें अपना हव्य वहन करने वाला दूत बनाया था. देवों तथा मानवों ने परम गतिसंपन्न, घृत से उत्पन्न एवं भली प्रकार बुलाए गए अग्नि को दीप्तिशाली नेत्र के समान धारण किया था. (६) त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतैः सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे. स वावृधान ओषधीभिरुक्षितोऽभि ज्यांसि पार्थिवा वि तिष्ठसे.. (७) हे अग्नि! प्राचीन तथा सुख चाहने वाले यजमान तुम्हें घी के द्वारा बुलाकर उत्तम समिधाओं से प्रज्वलित करते हैं. तुम बढ़ने पर ओषधियों द्वारा सींचे जाते हो एवं पार्थिव अन्नों को प्रकट करके वर्तमान रहते हो. (७) सूक्त—९ देवता—अग्नि त्वामग्ने हविष्मन्तो देवं मर्तास ईळते. मन्ये त्वा जातवेदसं स हव्या वक्ष्यानुषक्.. (१) हे दीप्तिशाली अग्नि! मनुष्य हव्य लेकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे जातवेद! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हवन की सामग्री को सदा वहन करते हो. (१) अग्निहोता दास्वतः क्षयस्य वृक्तबर्हिषः. सं यज्ञासश्चरन्ति यं सं वाजासः श्रवस्यवः.. (२) जिन अग्नि के साथ सभी यज्ञ चलते हैं एवं यजमान को कीर्ति दिलाने वाला हव्य जिन्हें प्राप्त होता है. वह हव्य सामग्री देने वाले एवं कुश उखाड़ने वाले यजमान के यज्ञ के लिए देवों को बुलाते हैं. (२) उत स्म यं शिशुं यथा नव जनिष्टारणी. धर्तारं मानुषीणां विशामग्निं स्वध्वरम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*