भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 835

हे अतिशय वृद्ध ऋषियों द्वारा स्तुत एवं गमनशील सूर्य! जिन स्तुतियों में तुम्हारे प्रति श्रद्धा भाव है, तुम्हें प्रसिद्ध करने वाले कर्मों से युक्त उन स्तुतियों द्वारा यजमान तुम्हारी सेवा करते हैं. वे जिस बात की कामना करते हैं, उसे वास्तविक रूप से जान लेते हैं. अपनी इच्छा से तुम्हारी सेवा करने वाले पर्याप्त फल पाते हैं. (८) समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता. अत्रा न हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्रा मतिर्विद्यते पूतबन्धनी.. (९) हमारा प्रधान स्तोत्र उसी प्रकार सूर्य को प्राप्त हो, जिस प्रकार सरिताएं सागर के पास जाती हैं. यज्ञशाला में की गई सूर्यस्तुति कभी समाप्त नहीं होती, जिस स्थान में सूर्य के प्रति पवित्र भावना रहती है, वहां यजमानों की अभिलाषा कभी अपूर्ण नहीं रहती. (९) स हि क्षत्रस्य मनसस्य चित्तिभिरेवावदस्य यजतस्य सध्रे:. अवत्सारस्य स्पृणवाम रण्वभिः शविष्ठं वाजं विदुषा चिदर्ध्यम्.. (१०)