भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 837

हे इंद्र एवं अग्नि! हम लोग अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को देवों द्वारा स्वीकार करने योग्य उत्तम स्तुतियों से बुलाते हैं। शोभन यज्ञ करने वाले ज्ञानीजन मरुतों के समान यज्ञसेवा करते हुए तुम दोनों को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। (४) एतो न्विद्य सुध्यो३ भवाम प्र दुच्छुना मिनवामा वरीयः. आरे द्वेषांसि सनुतर्दधामायाम प्राञ्चो यजमानमच्छ.. (५) हे देवो! यज्ञ के दिन तुम विशेष रूप से हमारे समीप आओ. इस दिन हम शुभकर्मों वाले बनते हैं, शत्रुओं को पराजित करते हैं, छिपे हुए शत्रुओं को समाप्त करते हैं एवं यजमानों के सामने जाते हैं. (५) एता धियं कृणवामा सखायोऽप या माताँ ऋणुत व्रजं गोः. यया मनुर्विशिशिप्रं जिगाय यया वणिग्वङ्कुरापा पुरीषम्.. (६) हे मित्रो! आओ. हम लोग मिलकर स्तुति करें. इन स्तुतियों से चुराई गई गायों के भवन का द्वार खुलता है. इन्हीं से मनु ने विशिशिप्र नामक असुर को जीता था एवं इन्हीं की सहायता से वणिक तुल्य कक्षीवान् ने वन में जाकर जल पाया था. (६) अनूनोदत्र हस्तयतो अद्रिरार्चन्येन दश मासो नवग्वाः. ऋतं यती सरमा गा अविन्दद्विश्वानि सत्याङ्गिराश्चकार.. (७) इस यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा सोमलता कूटने के लिए काम में आने वाले पत्थर शब्द करते हैं. इन्हीं पत्थरों की सहायता से निचुड़े हुए सोम द्वारा नवग्व एवं दशग्व यज्ञ करने वाले अत्रिवंशी ऋषियों ने इंद्र की पूजा की थी. सरमा ने यज्ञ में आकर गायों को प्राप्त कराया एवं अंगिरागोत्रीय ऋषियों के स्तोत्र सफल हुए. (७) विश्वे अस्या व्युषि माहिनायाः सं यद् गोभिरङ्गिरसो नवन्त. उत्स आसां परमे सधस्थ ऋतस्य पथा सरमा विदद्गाः.. (८) इस पूजनीया उषा का प्रकाश फैलते ही अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने गायों को प्राप्त किया. गोशाला में दूध दुहा जाने लगा, क्योंकि सत्य मार्ग से सरमा ने गायों को देख लिया था. (८) आ सूर्यो यातु सप्ताश्वः क्षेत्रं यदस्योर्विया दीर्घयाथे. रघुः श्येनः पतयदन्धो अच्छा युवा कविर्दीदयद्गोषु गच्छन्.. (९) सात घोड़ों के स्वामी सूर्य हमारे सामने आवें. सूर्य की लंबी यात्रा का क्षेत्र दीर्घ-गमन अपेक्षित करता है. सूर्य तीव्रगामी श्येन के समान हव्य के समीप आते हैं. अतिशय युवा एवं ज्ञानी सूर्य अपनी किरणों के साथ चलते हुए विशेषरूप से प्रकाशित होते हैं. (९) आ सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णोऽयुक्त यद्धरितो वीतपृष्ठाः. ebook converter DEMO Watermarks*