भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 842

सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव देवं वो अद्य सवितारमेषे भगं च रत्नं विभजन्तमायोः. आ वां नरा पुरुभुजा ववृत्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन्.. (१) तुम यजमानों के कल्याण के लिए हम आज सविता एवं भग के समीप जाते हैं. ये दोनों यजमानों को धन देते हैं. हे नेता एवं बहुत भोग करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारी मित्रता की अभिलाषा करते हुए हम प्रतिदिन तुम्हारे सामने जाते हैं. (१) प्रति प्रयाणमसुरस्य विद्वान्सूक्तैर्देवं सवितारं दुवस्य. उप ब्रुवीत नमसा विजानञ्ज्र्यैषं च रत्नं विभजन्तमायोः.. (२) हे अंतरात्मा! तुम शत्रुओं का नाश करने वाले सूर्यदेव को वापस आया जानकर स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करो. उन्हें मानवों को उत्तम रत्न एवं धन बांटने वाला जानकर हव्य एवं स्तुतियां समर्पित करो. (२) अदत्रया दयते वार्याणि पूषा भगो अदितिर्वस्त उस्रः. इन्द्रो विष्णुर्वरुणो मित्रो अग्निरहानि भद्रा जनयन्त दस्माः.. (३) पोषणकर्त्ता, सेवा करने योग्य एवं टुकड़े न होने वाले अग्नि अपनी ज्वालाओं द्वारा उत्तम लकड़ी को खाते हैं एवं तेज का विस्तार करते हैं. इंद्र, विष्णु, वरुण, मित्र, अग्नि आदि दर्शनीय देवगण हमारे दिवसों को कल्याणमय बनाते हैं. (३) तन्नो अनर्वा सविता वरूथं तत्सिन्धव इषयन्तो अनु ग्मन्. उप यद्द्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्नाः.. (४) सविता देव का कोई तिरस्कार नहीं कर पाया. वे हमें उत्तम धन दें. बहती हुई नदियां उसी धन के लिए गतिशील हों. हम यज्ञ के होता बनकर इसलिए स्तोत्र बोलते हैं कि हम धनों के स्वामी बनें एवं हमारे पास उत्तम अन्न हो. (४) प्र ये वसुभ्य ईवदा नमो दुर्ये मित्रे वरुणे सूक्तवाचः. अवैत्वभ्वं कृणुता वरीयो दिवस्पृथिव्योरवसा मदेम.. (५) जिन यजमानों ने वसुओं को गतिशील अन्न भेंट किया है एवं मित्र वरुण के प्रति जिन्होंने स्तुतियां बोली हैं, उन्हें महान् तेज प्राप्त हो. हे देवो! तुम उन्हें श्रेष्ठ सुख दो. हम धरती और आकाश की रक्षा पाकर प्रसन्न हों. (५) सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव ebook converter DEMO Watermarks*