ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 890, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे पर्जन्य! जब तुम गर्जन करते हुए पापी मेघों को नष्ट करते हो, उस समय यह सारा संसार प्रसन्न होता है तथा जगत् की सब वस्तुएं मुदित होती हैं. (९) अवर्षीर्वर्षमुदु षू गृभायाकर्धन्वान्यत्येतवा उ. अजीजन ओषधीर्भोजनाय कमुत प्रजाभ्योऽविदो मनीषाम्.. (१०) हे पर्जन्य! तुमने जल बरसाया. अब जल रोक लो. तुमने सूखे स्थानों को जलपूर्ण कर दिया है, जिन्हें बचाकर चलना पड़ता है. तुमने प्रजाओं के भोजन के लिए ओषधियां एवं जल उत्पन्न किया, इस कारण तुम्हें उनकी स्तुतियां प्राप्त हुईं. (१०) सूक्त—८४ देवता—पृथ्वी बळित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवि. प्र या भूमिं प्रवत्वति मह्ना जिनोषि महिनि.. (१) हे महती एवं शक्तिशालिनी पृथ्वी! तुम सभी प्राणियों को प्रसन्न करती हो एवं धारण करती हो. (१) स्तोमासस्त्वा विचारिणि प्रति क्षोभन्त्यक्तुभि:. प्र या वाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि.. (२) हे विचरण करने वाली पृथ्वी! स्तोता गतिशील स्तोत्रों से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. हे श्वेतरंग वाली! तुम घोड़े के समान गरजने वाले बादल को दूर फेंकती हो. (२) दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ष्र्योजसा. यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टय:.. (३) हे पृथ्वी! तुम्हारे बादल जब चमकते हुए जल बरसाते हैं, तब तुम अपनी शक्ति द्वारा वनस्पतियों को धारण करती हो. (३) सूक्त—८५ देवता—वरुण प्र सम्राजे बृहदर्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय. वि यो जघान शमितेव चर्मोपस्तिरे पृथिवीं सूर्याय.. (१) हे अत्रि! तुम भली प्रकार राजमान, सर्वत्रप्रसिद्ध व उपद्रव नष्ट करने वाले वरुण के प्रति गंभीर एवं प्रिय वचन बोलो. कसाई जिस प्रकार मरे हुए पशुओं का चमड़ा फैलाता है, उसी प्रकार वरुण सूर्य के भ्रमण हेतु अंतरिक्ष को विस्तृत करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*