ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 892, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वा ता वि ष्य शिथिरेव देवाधा ते स्याम वरुण प्रियासः.. (८) हे वरुण! बेईमान जुआरी जिस प्रकार जानबूझ कर अपराध करता है, उसी प्रकार हमने जानकर या अनजाने में जो पाप किया है, उसे तुम पके फलों के समान हमसे दूर करो. हे वरुण! हम तुम्हारे प्रिय बनें. (८) सूक्त—८६ देवता—इंद्र व अग्नि इन्द्राग्नी यमवथ उभा वाजेषु मर्त्यम्. दृळ्हा चित्स प्र भेदति द्युम्ना वाणीरिव त्रितः.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! संग्राम में तुम्हारे द्वारा रक्षित लोग उसी प्रकार शत्रु के सुरक्षित धन का नाश करते हैं, जिस प्रकार विद्वान् अपने विरोधी के तर्क को काटता है. (१) या पृतनासु दुष्टरा या वाजेषु श्रवाय्या. या पञ्च चर्षणीरभीन्द्राग्नी ता हवामहे.. (२) जो युद्ध में हराए नहीं जा सकते, जो युद्धों में प्रशंसा के पात्र हैं एवं जो पांचों वर्णों की रक्षा करते हैं, उन इंद्र एवं अग्नि की हम स्तुति करते हैं. (२) तयोरिदमवच्छंवस्तिग्मा दिद्युन्मघोनोः. प्रति दृणा गभस्त्योर्गवां वृत्रघ्न एषते.. (३) शत्रुपराभवकारी बलयुक्त इंद्र एवं अग्नि जब एक रथ में बैठकर गायों को चुराने वाले वृत्र का नाश करने हेतु चलते हैं तब उन धनस्वामियों के हाथ में तेज धार वाला एवं चमकीला वज्र होता है. (३) ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे. पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गीर्वणस्तमा.. (४) हम वेग के स्वामी, दान के अधिपति, सब कुछ जानने वाले तथा स्तुतियों द्वारा अतिशय प्रशंसनीय इंद्र व अग्नि की स्तुति इसलिए करते हैं कि वे युद्ध में हमारे रथ को आगे बढ़ावें. (४) ता वृधन्तावनु द्यूनमर्ताय देवावदभा. अर्हन्ता चित्पुरो दधेंऽशेव देवावर्वते.. (५) हे मनुष्यों के समान सदा बढ़ने वाले तेजस्वी एवं पूज्य इंद्र व अग्नि देव! हम अश्व पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*