भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 904

वनों को जलाती हैं. (३) ये ते शुक्रासः शुचयः शुचिष्मः क्षां वपन्ति विषितासो अश्वाः. अध भ्रमस्त उर्विया वि भाति यातयमानो अधि सानु पृश्नेः.. (४) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम्हारी तेजपूर्ण ज्वालाएं धरती से घासरूपी बालों को मूंडती हैं एवं स्वच्छंद घोड़ों के समान इधर-उधर जाती हैं. इस समय तुम्हारी भ्रमणशील ज्वालाएं नानारूप वाली धरती के पर्वत पर चढ़ती हुई विशेषरूप से शोभा पाती हैं. (४) अध जिह्वा पापतीति प्र वृष्णो गोषुयुधो नाशनिः सृजाना. शूरस्येव प्रसितिः क्षातिरग्नेर्दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि.. (५) जैसे चुराई गई गायों के लिए लड़ने वाले इंद्र का वज्र बार-बार चलता था, उसी प्रकार कामवर्षी अग्नि की ज्वालाएं निकलती हैं. वीरों की दृढ़ता के समान असह्य अग्नि की भयानक ज्वालाएं वनों को जलाती हैं. (५) आ भानुना पार्थिवानि ज्रयांसि महस्तोदस्य धृषता ततन्थ. स बाधस्वाप भया सहोभिः स्पृधो वनुष्यन्व्नुषो नि जूर्व.. (६) हे अग्नि! तुम अपनी दीप्त ज्वालाओं से धरती के सब गंतव्य स्थानों पर अधिकार करो, भयंकर आपत्तियों को रोको, अपने तेज से स्पर्धा करने वालों की हिंसा करो एवं शत्रुओं का नाश करो. (६) स चित्र चित्रं चितयन्तमस्मे चित्रक्षत्र चित्रतमं वयोधाम्. चन्द्रं रयिं पुरुवीरं बृहन्तं चन्द्र चन्द्राभिर्गृणते युवस्व.. (७) हे विचित्र एवं आकर्षक शक्ति वाले तथा आनंदकारी अग्नि! हम प्रसन्नताकारक स्तुतियों वालों को तुम विचित्र, अद्वितीय यश देने वाला, अन्न धारण करने वाला एवं संतान से युक्त धन प्रदान करो. (७) सूक्त—७ देवता—वैश्वानर (अग्नि) मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्. कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः.. (१) स्तोताओं ने स्वर्ग के शीश तुल्य, धरती पर चलने वाले, सभी जनों से संबंधित, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न, मेधावी, तेजस्वी, यजमानों के यज्ञ के लिए सतत गमनशील, मुख तुल्य एवं रक्षक अग्नि को उत्पन्न किया. (१) नाभिं यज्ञानां सदनं रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त. ebook converter DEMO Watermarks*