भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1855 में से

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हे अग्नि देव! तुम मनुष्यों में वर्तमान इस यज्ञ में देवों को बुलाने वाले अतिशय स्तुतिपात्र व हमसे द्रोह न रखने वाले हो। तुम शुद्धि करने वाली एवं देवमुखरूपिणी ज्वाला से अपने ‘स्विष्टकृत’ नामक शरीर का यजन करो. (२) धन्या चिद्धि त्वे धिषणा वष्टि प्र देवाञ्जन्म गृणते यजध्यै. वेपिष्ठो अङ्गिरसां यद्ध विप्रो मधुच्छन्दो भनति रेभ इष्टौ.. (३) हे अग्नि! धन का कारण बनी हुई स्तुति तुम्हारी कामना करती है, क्योंकि तुम्हारे कारण यजमान देवों के निमित्त यज्ञ करने में समर्थ होता है. अंगिरा श्रेष्ठ स्तुतिकर्त्ता हैं एवं मेधावी भरद्वाज यज्ञ में छंद का उच्चारण करते हैं. (३) अदिद्युतत्स्वपाको विभावाग्ने यजस्व रोदसी उरूची. आयुं न यं नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पञ्च जना:.. (४) बुद्धिमान् एवं तेजस्वी अग्नि भली प्रकार प्रकाशित होते हैं. हे अग्नि! तुम विस्तृत धरती-आकाश की हव्य से पूजा करो. लोग जिस प्रकार अतिथि की पूजा करते हैं, उसी प्रकार यजमान हव्य द्वारा अग्नि को प्रसन्न करते हैं. (४) वृञ्जे ह यन्नमसा बर्हिरग्नावायामि सुघृतवती सुवृक्ति:. अम्यक्षि सद्म सदने पृथिव्या अश्रायि यज्ञ: सूर्ये न चक्षु:.. (५) जब हव्यों के साथ कुश अग्नि के पास लाया जाता है एवं कुश पर घी से भरा निर्दोष स्रुच रखा जाता है, तब धरती पर अग्नि के निवासरूप वेदी को बनाया जाता है एवं यज्ञकार्य सूर्य के प्रकाश के समान विस्तृत होता है. (५) दशस्या न: पूर्वणीक होतर्देवेभिरग्ने अग्निभिरिधान:. राय: सूनो सहसो वावसाना अति स्रसेम वृजनं नांह:.. (६) हे अनेक ज्वालाओं वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि! तुम अन्य दीप्ति वाली अग्नियों के साथ प्रज्वलित होकर हमें धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! तुम्हें हव्य से ढकने वाले हम पापरूपी शत्रु से दूर हों. (६) सूक्त—१२ देवता—अग्नि मध्ये होता दुरोणे बर्हिषो राळग्निस्तोदस्य रोदसी यजध्यै. अयं स सूनु: सहस ऋतावा दूरात्सूर्यो न शोचिषा ततान.. (१) देवों को बुलाने वाले तथा यज्ञ के स्वामी अग्नि धरती-आकाश के निमित्त यज्ञ करने के लिए यजमान के घर में स्थित होते हैं. बल के पुत्र एवं यज्ञसहित अग्नि दूर रहकर भी सूर्य के ebook converter DEMO Watermarks*