भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 1855 में से

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हे अनुकूल दीप्ति वाले एवं धरती-आकाश में वर्तमान अग्नि देव! तुम हमारी स्तुति देवों को भली प्रकार बताओ एवं हम स्तोताओं को शोभनगृह के साथ सुख दो. हम शत्रुओं को नष्ट करके पापों के पार जावें, तुम्हारी कृपा से हम शत्रु से छुटकारा पावें. (६) सूक्त—१५ देवता—अग्नि इमम् षु वो अतिथिमुषर्बुधं विश्वासां विशां पतिमृञ्जसे गिरा. वेतीद्दिवो जनुषा कच्चिदा शुचिर्ज्योक्चिदत्ति गर्भो यदच्युतम्.. (१) हे भरद्वाज! तुम प्रातःकाल जागने वाले, प्रजाओं के रक्षक, सदा गतिशील एवं स्वतः पवित्र अग्नि को स्तुतियों द्वारा भली-भांति प्रसन्न करो. अग्नि सदा द्युलोक से यज्ञ में आते हैं एवं दोषरहित हव्य को खाते हैं. (१) मित्रं न यं सुधितं भृगवो दधुर्वनेष्वातावीड्यमूर्ध्वशोचिषम्. स त्वं सुप्रीतो वीतहव्ये अद्भुत प्रशस्तिभिर्महयसे दिवेदिवे.. (२) हे अरणिरूप काष्ठ में सुरक्षित, स्तुतियोग्य, ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं वाले एवं विचित्र अग्नि! भृगु ने तुम्हें मित्र के समान अपने घर में स्थापित किया. उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन पूजा करने वाले भरद्वाज के प्रति तुम भली प्रकार प्रसन्न बनो. (२) स त्वं दक्षस्यावृको वृधो भूर्यः परस्यान्तरस्य तरुषः. रायः सूनो सहसो मर्त्येष्वा छर्दैर्यच्छ वीतहव्याय सप्रथो भरद्वाजाय सप्रथः.. (३) हे बाधकरहित अग्नि! तुम यज्ञकर्त्ता यजमान को बढ़ाने वाले तथा दूरवर्ती एवं समीपवर्ती शत्रु से रक्षा करने वाले हो. हे बलपुत्र अग्नि! तुम सर्वथा बढ़कर मनुष्यों में भरद्वाज को धन एवं गृह दो. (३) द्युतानं वो अतिथिं स्वर्णरम्ग्निं होतारं मनुषः स्वध्वरम्. विप्रं न द्युक्षवचसं सुवृक्तिभिर्हव्यवाहमरतिं देवमृञ्जसे.. (४) हे भरद्वाज! तुम हव्य वहन करने वाले, दीप्तिसंपन्न, अपने अतिथि, स्वर्ग के नेता, मनु के यज्ञ में देवों को बुलाने वाले, शोभनयज्ञ वाले, मेधावी, तेजपूर्णवाणी वाले एवं सबके स्वामी अग्नि देव को उत्तम स्तुतियों से प्रसन्न करो. (४) पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन्नुरुच उषसो न भानुना. तूर्वन्न यामन्नेतशस्य नू रण आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (५) जो अग्नि उषा के प्रकाश के समान पावक एवं ज्ञान कराने वाली दीप्ति से धरती पर विराजमान होते हैं एवं सूर्य के विरुद्ध संग्राम में एतश ऋषि की रक्षा जिन्होंने शत्रुहिंसक वीर ebook converter DEMO Watermarks*