ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 916, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयज्ञस्य वा निशितिं वोदितिं वा तमित्पृणक्षि शवसोत राया.. (११) हे शूर एवं क्रांतदर्शी अग्नि! तुम उस व्यक्ति की रक्षा करते हो एवं अभिलाषाएं पूर्ण करते हो, जो तुम्हारी स्तुति करता है. जो यज्ञसाधन हव्य का संस्कार करता है अथवा उसे उत्तम बनाता है, तुम उस व्यक्ति को बल संपन्न करके धनों से पूर्ण करते हो. (११) त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्. सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहस्री.. (१२) हे अग्नि! शत्रु से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! पाप से हमारी रक्षा करो. हमारा दोषरहित हव्यान्र तुम्हारे समीप पहुंचे एवं तुम्हारा दिया हुआ हजारों प्रकार का धन हमें मिले. (१२) अग्निहौता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः. देवानामृत यौ मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा.. (१३) देवों को बुलाने वाले, गृह के स्वामी, दीप्तिशाली एवं सबको जानने वाले अग्नि सभी जन्मधारियों को जानते हैं. देवों एवं मानवों में अतिशय यज्ञकर्त्ता एवं सत्यशील अग्नि उत्तमरूप से देवों का यजन करें. (१३) अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होत: पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा. ऋता यजासि महिना वि यद्भूईर्व्या वह यविष्ठ या ते अद्य.. (१४) हे यज्ञ संपन्न करने वाले एवं पवित्रप्रकाश वाले अग्नि! इस समय तुम यजमान के कर्त्तव्य की कामना करो. तुम देवों के यज्ञकर्त्ता हो, इसलिए देवयजन करो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अपने महत्त्व से सर्वव्यापक हुए हो. आज तुम्हें जो भी हव्य दिया जावे, उसे वहन करो. (१४) अभि प्रयांसि सुधितानि हि ख्यो नि त्वा दधीत रोदसी यजध्यै. अवा नो मघवन्वाजसातावग्ने विश्वानि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (१५) हे अग्नि! वेदी पर भली-भांति रखे हविरूप अन्नों को देखो. धरती-आकाश में यज्ञ करने के निमित्त तुम्हारी स्थापना की गई है. हे धनस्वामी अग्नि! अन्न निमित्तक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम सभी पापों से छूट जावें. (१५) अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्. कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु.. (१६) हे शोभन ज्वालाओं वाले एवं देवप्रमुख अग्नि! कंबलों से युक्त घोंसले के समान एवं घृतसंपन्न वेदी पर सभी देवों के साथ बैठो तथा यज्ञकर्त्ता यजमान के कल्याण के निमित्त ebook converter DEMO Watermarks*