ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 918, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंईजे यज्ञेषु यज्ञियम्.. (४) हे अग्नि! भरत ने सुख पाने के लिए ऋत्विजों के साथ मिलकर तुम्हारी स्तुति की थी एवं तुझ यज्ञयोग्य अग्नि का हव्यान्नों द्वारा यजन किया था. (४) त्वमिमा वार्या पुरु दिवोदासाय सुन्वते. भरद्वाजाय दाशुषे.. (५) हे अग्नि! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को जिस प्रकार उत्तम धन अधिक मात्रा में दिए थे, उसी प्रकार हव्य देने वाले मुझ भरद्वाज को दो. (५) त्वं दूतो अमर्त्य आ वहा दैव्यं जनम्. शृण्वन्विप्रस्य सुष्टुतिम्.. (६) हे मरणरहित एवं देवदूत अग्नि! तुम मेधावी भरद्वाज की शोभन स्तुति को सुनते हुए इस यज्ञ में देवों को लाओ. (६) त्वामग्ने स्वाध्यो३ मर्तासो देववीतये. यज्ञेषु देवमीळते.. (७) हे अग्नि देव! शोभन चिंतन वाले मनुष्य देवों को प्रसन्न करने के हेतु यज्ञों में तुम्हारी स्तुति करते हैं. (७) तव प्र यक्षि सन्दृशमुत क्रतुं सुदानव:. विश्वे जुषन्त कामिन:.. (८) हे अग्नि! हम सब दानशील यजमान तुम्हारे दर्शनीय तेज की पूजा तथा सेवा करते हैं. (८) त्वं होता मनुर्हितो वह्निरासा विदुष्टर:. अग्ने यक्षि दिवो विश:.. (९) हे ज्वालाओं द्वारा हव्य वहन करने वाले एवं उत्तम विद्वान् अग्नि! मनु ने तुम्हें यज्ञ का होता नियुक्त किया है. तुम देवों का यजन करो. (९) अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१०) हे अग्नि! देवों को हव्य देने के लिए तुम्हारी स्तुति की जा रही है. तुम हव्य भक्षण के लिए आओ एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१०) तं त्वा समिद्भीरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (११) हे अगांररूप अग्नि! हम समिधाओं एवं घृत द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अधिक दीप्त बनो. (११) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*