भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 920, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 920

हम हव्य के स्वामी, दिवोदास राजा के शत्रुओं का नाश करने वाले अधिक ज्ञान वाले एवं यजमानों के पालक अग्नि से स्तुतियों के सहित मिलते हैं. (१९) स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना. वन्वन्नवातो अस्तृतः.. (२०) काष्ठों को जलाने वाले, शत्रुओं के आक्रमण से रहित एवं अपराजित अग्नि अपनी महिमा से सभी सांसारिक संपत्तियां हमें दें. (२०) स प्रत्नवन्नवीयसाग्ने द्युम्नेन संयता. बृहत्ततन्थ भानुना.. (२१) हे अग्नि! तुम प्राचीन के समान ही नवीन तेज से युक्त होकर अपनी किरणों द्वारा आकाश का विस्तार करते हो. (२१) प्र वः सखायो अग्नये स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया. अर्च गाय च वेधसे.. (२२) हे मित्र ऋत्विजो! तुम यज्ञविधाता एवं शत्रुविनाशक अग्नि के प्रति यह स्तोत्र गाओ तथा हव्य दो. (२२) स हि यो मानुषा युगा सीदद्धोता कविक्रतुः. दूतश्च हव्यवाहनः.. (२३) देवों को बुलाने वाले, परम मेधावी, मानवों के यज्ञों के समय देवदूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में बिछाये हुए कुशों पर बैठें. (२३) ता राजाना शुचिव्रतादित्यान्मारुतं गणम्. वसो यक्षीह रोदसी.. (२४) हे निवास स्थान देने वाले अग्नि! तुम इस यज्ञ में दीप्तिसंपन्न एवं पवित्रकर्मा मित्र, वरुण, आदित्य मरुद्गण तथा धरती-आकाश का यजन करो. (२४) वस्वी ते अग्ने सन्दृष्टिरिषयते मत्र्याय. ऊर्जो नपादमृतस्य.. (२५) हे बलपुत्र एवं मरणरहित अग्नि! तुम्हारा प्रशंसायोग्य तेज यजमान को अन्न देता है. (२५) क्रत्वा दा अस्तु श्रेष्ठोऽद्य त्वा वन्वन्तसुरेक्णाः. मर्त आनाश सुवृक्तिम्.. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*