भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 925, कुल 1855 में से

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चुराई हुई गाएं छिपाए हुए था तथा अपनी शक्ति से स्थिर था. (५) तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीथः. और्णोर्दुर उसियाभ्यो वि दृळ्होदूर्वाद्विगा असृजो अङ्गिरस्वान्.. (६) हे इंद्र! तुमने अपने कार्यों, बुद्धि और सामर्थ्य द्वारा कमजोर गायों को दुधारू बनाया है, गायों के बाहर जाने के लिए पर्वत में द्वार बनाए हैं एवं अंगिरागोत्रीय ऋषियों से मिलकर उन्हें घेरे से स्वतंत्र किया है. (६) पप्रथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यांमृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः. अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य.. (७) हे महान् इंद्र! तुमने अपने महान् कर्म द्वारा धरती को विशेष रूप से पूर्ण बनाया है, विस्तृत आकाश को स्थिर किया है एवं देवों के माता-पितारूप धरती-आकाश को धारण किया है. धरती-आकाश अति प्राचीन एवं उदक के जन्मदाता हैं. (७) अध त्वा विश्वे पुर इन्द्र देवा एकं तवसं दधिरे भराय. अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्त्स्वर्षार्ता वृणत इन्द्रमत्र.. (८) जब वृत्र असुर ने संग्राम के लिए देवों को ललकारा तो उन्होंने तुम्हें ही अपने आगे चलने वाला बनाया. हे बलवान् इंद्र! मरुतों के युद्ध में भी तुम्हें वरण किया गया था. (८) अध द्यौश्चित्ते अप सा नु वज्राद्द्वितानमद्विद्यसा स्वस्य मन्योः. अहिं यदिन्द्रो अभ्योहसानं नि चिद्विश्वायुः शयथे जघान.. (९) हे अधिक अन्न के स्वामी इंद्र! जब तुमने आक्रमणकारी वृत्र को धरती पर सोने के लिए मार डाला था, तब तुम्हारे क्रोध एवं वज्र से आकाश भी कांप गया था (९) अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृत्तच्छताश्रिम्. निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणग्ऋजीषिन्.. (१०) हे उग्र इंद्र! त्वष्टा ने तुम्हारे लिए हजार धार एवं सौ टुकड़ों वाला वज्र बनाया था. हे सोमलता का नीरस अंश ग्रहण करने वाले इंद्र! तुमने उस वज्र द्वारा निश्चित अभिलाषा वाले शत्रुओं से भिड़ने को उतावले एवं गर्जन करते हुए वृत्र को पीस डाला था. (१०) वर्धान्यं विश्वे मरुतः सजोषाः पचच्छतं महिषाँ इन्द्र तुभ्यम्. पूषा विष्णुस्त्रीणि सरांसि धावन्वृत्रहणं मदिरमंशुमस्मै.. (११) हे इंद्र! परस्पर समान प्रीति वाले मरुद्गण तुम्हें स्तोत्रों द्वारा बढ़ाते हैं. तुम्हारे लिए पूषा तथा विष्णु ने सौ भैंसे पकाए हैं तथा तीन पात्रों को नशीले एवं शत्रुनाशक सोम से भरा है. ebook converter DEMO Watermarks*