ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 929, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिवोदास को विपत्ति से बचाया. (१३) अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्. करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः.. (१४) हे इंद्र! सभी स्तोता इस समय मेघ का भेदन करने के लिए तुझ परम मेधावी की स्तुति कर रहे हैं. तुम स्तुतियां सुनकर उसी समय दरिद्र तथा पीड़ित यजमान एवं उसकी संतान को धन देते हो. (१४) अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः. कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः.. (१५) हे इंद्र! धरती, आकाश एवं मरणरहित समस्त देव तुम्हारे बल को स्वीकार करते हैं. हे बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम अपना अनकिया काम करो. इसके बाद तुम यज्ञों में अधिक नवीन स्तोत्र को जन्म दो. (१५) सूक्त—१९ देवता—इंद्र महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः. अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१) जैसे राजा मनुष्यों की कामना पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं की इच्छा पूरी करने वाले इंद्र आवें. दोनों लोकों में पराक्रम दिखाने वाले एवं शत्रुसेनाओं द्वारा अपराजित इंद्र हमारे सामने वीरता के कार्यों के लिए बढ़ते हैं. विस्तृत शरीर एवं गुणों वाले इंद्र को यजमान भली प्रकार जानते हैं. (१) इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्. अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि.. (२) हमारी स्तुति दान के निमित्त महान्, गमनशील, युवा एवं शत्रुओं द्वारा अपराजित बल से उन्नत इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र उत्पन्न होते ही अधिक मात्रा में बढ़ गए थे. (२) पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि. यूथेव पश्वः पशूपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ.. (३) हे शांत मन वाले इंद्र! तुम अन्न देने के लिए अपने विस्तीर्ण, कार्यकुशल एवं अधिक देने वाले हाथों को हमारे सामने करो. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी प्रकार तुम युद्ध में हमारा संचालन करो. (३) तं व इन्द्रं चतिनमस्य शाकैरहि नूनं वाजयन्तो हुवेम. ebook converter DEMO Watermarks*