ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 949, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको धारण करते हैं, कोई भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकता. इंद्र प्रतिदिन गोलाकार सूर्य को देखने योग्य बनाते हैं. शोभन-कर्म वाले इंद्र ने सारे संसार को विस्तृत किया है. (२) अद्या चिन्नू चित्तदपो नदीनां यदाभ्यो अरदो गातुमिन्द्र. नि पर्वता अदसदो न सेदुस्त्वया दृळ्हानि सुक्रतो रजांसि.. (३) हे इंद्र! पहले के समान आज भी तुम्हारा नदियों से संबंधित जलरूपी कर्म विद्यमान है. तुमने इनके बहने के लिए मार्ग बनाया था. खाना खाने के लिए बैठे मनुष्यों के समान पर्वत तुम्हारी आज्ञा से बैठ गए थे. हे शोभन कर्म वाले इंद्र! तुमने लोकों को दृढ़ बनाया है. (३) सत्यमित्तन्न त्वावाँ अस्तीन्द्र देवो न मर्त्यो ज्यायान्. अहन्नहिं परिशयानमर्णोऽवासृजो अपो अच्छा समुद्रम्.. (४) हे इंद्र! यह बात सत्य है कि तुम्हारे समान दूसरा नहीं है. कोई भी मनुष्य या देव तुमसे बड़ा नहीं है. तुमने जल को रोककर सोए हुए मेघ को मारा एवं जल को समुद्र में बहने के लिए स्वतंत्र बनाया. (४) त्वमपो वि दुरो विषूचीरिन्द्र दृळ्हमरुजः पर्वतस्य. राजाभवो जगतश्चर्षणीनां साकं सूर्य जनयन् द्यामुषासम्.. (५) हे इंद्र! तुमने वृत्र असुर द्वारा रोके हुए जल को बहने के लिए स्वच्छंद बनाया एवं मेघ के दृढ़ जलावरोध को नष्ट किया था. तुम सूर्य, उषा एवं स्वर्ग को एक साथ ही प्रकाशित करते हुए प्रजाओं के राजा बने. (५) सूक्त—३१ देवता—इंद्र अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः. वि तोके अप्सु तनये च सुरेऽवोचन्त चर्षणयो विवाचः.. (१) हे धनपति इंद्र! तुम धनों के एकमात्र स्वामी हो. हे इंद्र! तुम अपने दोनों हाथों में प्रजाओं को धारण करते हो. प्रजाएं, पुत्र, जल एवं वीर पुत्र पाने के निमित्त हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) त्वद्वियेन्द्र पार्थिवानि विश्वाच्युता चिच्च्यावयन्ते रजांसि. द्यावाक्षामा पर्वतासो वनानि विश्वं दृळ्हं भयते अज्मन्ना ते.. (२) हे इंद्र! मेघ तुम्हारे भय के कारण विस्तृत एवं आकाश में उत्पन्न जल को बरसाते हैं. वैसे वह जल नीचे गिराने योग्य नहीं है. तुम्हारे आगमन से धरती-आकाश, पर्वत, वन एवं समस्त प्राणी डरते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*