भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 962, कुल 1855 में से

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शरीर धारण करते हुए हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर आविर्भूत हों. (८) द्युमत्तमं दक्षं धेह्यस्मे सेधा जनानां पूर्वीररातीः. वर्षीयो वय कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि.. (९) हे इंद्र! हमें अत्यंत दीप्तिशाली बल दो. हम स्तोता लोगों के बहुत से शत्रुओं को हमसे दूर करो, अपनी श्रेष्ठ बुद्धियों द्वारा हमें उत्तम धन दो एवं धन का भोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. (९) इन्द्र तुभ्यमिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः. नकिरापिर्ददृशे मर्त्यत्रा किमङ्ग रध्रचोदनं त्वाहुः.. (१०) हे धनस्वामी इंद्र! हम तुम्हारे लिए ही हैं. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम हव्यदाताओं के प्रतिकूल मत होना. तुम्हारे अतिरिक्त मनुष्यों में हमारा कोई भी बंधु नहीं है. हे प्रिय इंद्र! इसीलिए प्राचीन लोगों ने तुम्हें धन का प्रेरक कहा है. (१०) मा जस्वने वृषभ नो रीरीथा मा ते रेवतः सख्य रिषाम. पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः.. (११) हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमें हानिकारक राक्षसों को मत सौंपना. तुझ धनस्वामी की मित्रता पाकर हम दुःखी न हों. शत्रुओं तक तुम्हारी रस्सियां फैली हुई हैं. तुम सोम न निचोड़ने वालों को मारो एवं हव्य न देने वालों को समाप्त करो. (११) उद्भ्राणीव स्तनयन्नियर्तीन्द्रो राधांस्यश्व्यानि गव्या. त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः.. (१२) गरजते हुए पर्जन्य जिस प्रकार मेघों को जन्म देते हैं, उसी प्रकार इंद्र होताओं को देने के लिए घोड़े एवं गो-हितकारी धन उत्पन्न करते हैं. तुम प्राचीन काल से स्तोताओं के रक्षक हो. धनी लोग दानहीन बनकर हमें कष्ट न दें. (१२) अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा. यः पूर्वार्याभिरुत नूतनाभिर्गीर्भिर्वावृधे गृणतामृषीणाम्.. (१३) हे वीर अध्वर्युगण! महान् इंद्र को सोमरस भेंट दो. वे सोम के राजा हैं. ये स्तुतिकर्त्ता ऋषियों की प्राचीन एवं नवीन स्तुतियों से वृद्धि को प्राप्त हुए हैं. (१३) अस्य मदे पुरु वर्पांसि विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान. तमु प्र होषि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै.. (१४) विद्वान् एवं अद्वितीय इंद्र ने इस सोमरस के नशे में अनेक विरोधी शत्रुओं को मार ebook converter DEMO Watermarks*