भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 999, कुल 1855 में से

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इन्द्राग्नी शृणुतं हवं यजमानस्य सुन्वतः. वीतं हव्यान्या गतं पिबतं सोम्यं मधु.. (१५) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की पुकार सुनो, उसके हव्य की अभिलाषा करो. उसके यज्ञ में आओ एवं उसका मधुर सोम पिओ. (१५) सूक्त—६१ देवता—सरस्वती इयमददाद्रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्रयश्वाय दाशुषे. या शश्वन्तमचाखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति.. (१) इन सरस्वती ने हव्य देने वाले वध्र्यश्व को शीघ्रगामी एवं ऋण से छुटकारा दिलाने वाला दिवोदास नामक पुत्र दिया था. इन्होंने सदा अपने को तृप्त करने वाले एवं दान न करने वाले पणि को नष्ट किया था. तुम्हारे ये दान महान् हैं. (१) इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः. पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः.. (२) यह सरस्वती अपने बलों एवं महान् लहरों द्वारा किनारे के पहाड़ों की चोटियों को इस प्रकार तोड़ती हैं, जिस प्रकार कमल की जड़ खोदने वाला कीचड़ को बिखेर देता है, मैं दूरवर्ती वृक्षादि को नष्ट करने वाली सरस्वती की अपनी स्तुतियों एवं यज्ञकर्मों द्वारा अपनी रक्षा के निमित्त सेवा करता हूं. (२) सरस्वति देवनिदो निबर्हय प्रजां विश्वस्य बॄसयस्य मायिनः. उत क्षितिभ्योऽवनीरविन्दो विषमेभ्यो अस्रवो वाजिनीवति.. (३) हे सरस्वती! देवनिंदकों एवं सर्वत्र-व्याप्त मायावी वृत्र असुर का नाश करो. हे अन्न की स्वामिनी! तुम असुरों द्वारा छीनी हुई धरती मनुष्यों को दिलाओ एवं इनके लिए जल प्रवाहित करो. (३) प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. धीनामवित्र्यवतु.. (४) अन्न की स्वामिनी एवं स्तोताओं की रक्षा करने वाली सरस्वती अन्नों द्वारा हमारी रक्षा करें. (४) यस्त्वा देवि सरस्वत्युपब्रूते धने हिते. इन्द्रं न वृत्रतूर्ये.. (५) हे सरस्वती देवी! जो स्तोता धन निमित्तक युद्ध में इंद्र के समान तुम्हारी स्तुति करता है, तुम उसकी रक्षा करो. (५) त्वं देवि सरस्वत्यवा वाजेषु वाजिनि. रदा पूषेव नः सनिम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*