भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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५६ रुद्रयामलतन्त्रम् एक अंकोलवृक्षके नीचे जलपूर्ण कलश धर उसी पर महादेवके लिंगका एक २ प्रहरपर अघोर मंत्रसे रातदिन पूजन करे ॥५२॥५३॥ फलं पुष्पं सुहारीं च निवेद्य सुसमाहितः ॥५४॥ घटे निधाय तां पूजां नित्यं नित्यं प्रयत्नतः ॥ यदांकोले फलं पातं फलमादाय पक्वकम् ॥५५॥ बीजानि च पृथक् कृत्वा दीर्घभांडे समाधयेत् ॥ तस्य मुखे टंकणं च मृदा च लेपयेन्मुखम् ॥५६॥ उच्चे स्थाप्य च तं भांडं शुष्कयेत्सुसमाहितः ॥ अधश्छिद्रं च कर्तव्यं ताम्रपात्रं निधापयेत् ॥५७॥ फलफूल पूरी सावधान होकर घरे, कलशके समीप वा घडाके भीतर रोज २ यत्नसे पूजा घरे और जब अंकोलमें फल लगे तब पक्वफल लेकर बीज- दूर कर एक बडी हांडीमें घरे, ऊपरसे सोहागा डाले, माटीसे मुख बंद कर सुखानेके वास्ते घाममें ऊँचेपर धरदे, पेंदीमें छिद्रकर नीचे ताम्रका बरतन धर देवे ॥५४॥५५॥५६॥५७॥ घर्मे स्थाप्ये च भांडे च तैलं निःसरते तदा ॥ अर्द्धमासं च तैलं हि मृतस्य नस्यमाचरेत् ॥ घामके जोरसे पंदरह दिनमें तेल निकसे तब वह तेल लेकर लोथके नासिकामें डाले ॥५८॥ विषभक्षणप्रेतेन मृतो वा कालतोऽपि वा ॥ सजीवो तत्क्षणाज्जातो शम्भोर्वचनसादतः ॥५९॥